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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 219 of 526

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Page 219

तृतीयोऽध्यायः १३३

देश में राजा, धनी, वेद का ज्ञाता ब्राह्मण, वैद्य, आचार और देश अपने से विरुद्ध प्रतीत हों वहां पर एक दिन भी नहीं ठहरना चाहिये ।

नपुंसकश्च स्त्री बालश्चण्डो मूर्खश्च साहसी ।
यत्राधिकारिणश्चैते न तत्र दिवसं वसेत् ॥ ४५ ॥

जिस राज्य में नपुंसक ( मेहरा ), स्त्री, बालक, अत्यन्त क्रोधी, मूर्ख या साहसी ( सहसा बिना विचारे कार्य करनेवाला ) इनमें से कोई भी अधिकारी वर्ग का हो, वहां पर एक दिन भी नहीं ठहरना चाहिये ।

अविवेकी यत्र राजा सभ्या यत्र तु पाक्षिकाः ।
सन्मार्गोझितविद्वांसः साक्षिणोऽनृतवादिनः ॥ ४६ ॥
दुरात्मनां च प्राबल्यं स्त्रीणां नीचजनस्य च ।
यत्र नेच्छेद्धनं मानं वसतिं तत्र जीवितम् ॥ ४७ ॥

**अविवेकी राजादिक से धनादि की इच्छा करने का निषेध—**जहां पर राजा विवेक करनेवाला न हो और राजसभा के सभासद्-गण पक्षपात रखनेवाले हों, सदाचार से हीन पण्डित लोग हों, साक्षीगण ( गवाही देनेवाले लोग ) झूठ बोलनेवाले हों और जहां दुष्टों, स्त्रियों एवं नीचजनों की प्रबलता हो वहां पर रहने से 'धन, इज्जत, रहने के लिये स्थान और जीवन इनकी रक्षा होगी' इसकी इच्छा भी न करे अर्थात् कल्याण नहीं है अतः वहां रहना अनुचित है ।

माता न पालयेद्बाल्ये पिता साधु न शिक्षयेत् ।
राजा यदि हरेद्वित्तं का तत्र परिदेवना ॥ ४८ ॥

**मात्रादिक के पालनादि न करने पर शोक न करने का निर्देश—**यदि बाल्यकाल में माता पालन एवं पिता अच्छी प्रकार से शिक्षा न दिलावे और राजा होकर यदि प्रजा का धन हरण करे तो इसमें खेद करना वृथा है । अर्थात् ऐसी स्थिति में बालक या प्रजा का अपना कोई दोष नहीं है अतः खेद व्यर्थ ही होता है ।

सुसेविताः प्रकुप्यन्ति मित्रस्वजनपार्थिवाः ।
गृहमग्न्यशनिहतं का तत्र परिदेवना ॥ ४९ ॥

मित्र, स्वजन तथा राजा इनकी भलीभांति सेवा करने पर भी यदि ये कुपित हों और गृह अग्नि से या बिजुली गिरने से नष्ट हो जाय तो अपना कोई वश न होने से खेद करना वृथा है ।

आप्तवाक्यमनादृत्य दर्पेणाचरितं यदि ।
फलितं विपरीतं तत् का तत्र परिदेवना ॥ ५० ॥