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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 178 of 526

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Page 178

६२ : शुक्रनीतिः

स्त्रीभिस्तद्वर्धिभिः पापैर्वैरिभूतैर्निराकृतैः ॥ २३४ ॥
एकार्थचर्यां साहित्यं संसर्गं च विवर्जयेत् ।
राजा को मित्र मानने का एवं उनकी स्त्री आदि के साथ सहवास का निषेध—'राजा मेरा परम मित्र है'—ऐसा समझ कर मनमाना व्यवहार न करे। और स्वामी को चाहनेवाली स्त्रियों एवं स्वामी के साथ पाप (बुरा) व्यवहार या वैरभाव रखनेवाले किंवा स्वामी से तिरस्कृत लोगों के साथ मिलकर किसी कार्य को करना या उनके साथ रहना या किसी प्रकार का संबन्ध रखना त्याग दे।

वेषभाषानुकरणं न कुर्यात्पृथिवीपतेः ॥ २३५ ॥
सम्पन्नोपि च मेधावी न स्पर्धेत च तद्गुणैः ।
**राजवेषभूषा-धारण की नकल करने का निषेध—**राजा के वेष तथा भूषा का नकल न करे। गुणों से संपन्न तथा प्रतिभाशाली होने पर भी राजा के गुणों के साथ स्पर्धा न करे अर्थात् 'मैं राजा से अधिक गुणवान् हूँ' यह न दिखावे।

रागापरागौ जानीयाद्भर्तुः कुशलकर्मवित् ॥ २३६ ॥
इङ्गिताकारचेष्टाभ्यस्तदभिप्रायतां तथा ।
त्यजेद्विरक्तं नृपतिं रक्ते वृत्तिन्तु कारयेत् ॥ २३७ ॥
**राजा की विरक्ति तथा अनुरक्ति का ज्ञान रखने एवं तदनुसार त्याग तथा ग्रहण का निर्देश—**और निपुण लोगों के कर्म को अथवा राजा के या अपने शुभ कर्म को जाननेवाला होकर स्वामी के अनुराग अथवा विरक्ति को अर्थात् किस कार्य से स्वामी प्रसन्न या अप्रसन्न होते हैं—इस बात को एवं स्वामी के इशारा, आकार (मुखमुद्रा), और चेष्टा से उनके अभिप्राय को जाने। और यदि राजा को विरक्त जाने तो उसे छोड़ दे एवं अनुराग युक्त जाने तो उसके पास रहे।

विरक्तः कारयेन्नाशं विपक्षाभ्युदयं तथा ।
आशावर्धनकं कृत्वा फलनाशं करोति च ॥ २३८ ॥
अकोपोऽपि सकोपाभः प्रसन्नोऽपि च निष्फलः ।
वाक्यञ्च समदं वक्ति वृत्तिच्छेदं करोति च ॥ २३९ ॥
खद्यते विमुखश्चैव गुणसङ्कीर्त्तने कृते ।
दृष्टिं क्षिपत्यथान्यत्र क्रियमाणे च कर्मणि ॥ २४० ॥
विरक्तलक्षणं ह्येतद्रक्तस्य लक्षणं ब्रुवे ।
**विरक्त राजा के लक्षण—**राजा जिसके ऊपर विरक्त होता है उसका नाश करता है एवं उसके शत्रुओं का अभ्युदय (तरक्की) करता है। यदि स्वामी प्रथम आशा बढ़ाकर अन्त में कार्यफल को नष्ट कर देता है।