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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 167 of 526

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Page 167

द्वितीयोऽध्यायः
८१

को यन्त्रादि से ऊपर चढ़ाना, इन सबों को सुन्दर बनाने की क्रिया को जानता है उसी को गृहादियों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।

राजकार्योपयोग्यान् हि पदार्थान्वेत्ति तत्त्वतः ।
सञ्चिनोति यथाकाले सम्भाराधिप उच्यते ॥ १६३ ॥

जो यथार्थ रूप से राजा के कार्य में आने योग्य वस्तुओं को जानता है और उनका समयानुसार संग्रह करके रखता है वह 'सम्भाराधिप' पद के योग्य होता है ।

स्वधर्माचरणे दक्षो देवताराधने रतः ।
निःस्पृहः स च कर्तव्यो देवतुष्टिपत्तिः सदा ॥ १६४ ॥

**देवाध्यक्ष के लक्षण—**जो अपने धर्म के आचरण करने में चतुर, देवता की आराधना में निरत, स्वयं किसी वस्तु की इच्छा न रखनेवाला हो उसे 'देवपूजा का अध्यक्ष' अर्थात् पुजारियों के विभाग का स्वामी बनाना चाहिये ।

याचकं विमुखं नैव करोति नं च संग्रहम् ।
दानशीलश्च निर्लोभो गुणज्ञश्च निरालसः ॥ १६५ ॥
दयालुर्मृदुवाग्दान-पात्रविन्नति-तत्परः ।
नित्यमेभिर्गुणैर्युक्तो दानाध्यक्षः प्रकीर्तितः ॥ १६६ ॥

**दानाध्यक्ष के लक्षण—**जो याचकों को विमुख नहीं करता है और स्वयं संग्रह भी नहीं करता है एवं दानशील, लोभरहित, गुणज्ञ ( दूसरे के गुण को जानने वाला ), आलस्यरहित, दयालु, मधुरभाषी, दान देने योग्य व्यक्तियों को पहचानने वाला और विनम्र होता है वही व्यक्ति इन गुणों से सदा युक्त रहनेवाला होने से 'दानाध्यक्ष' पद के योग्य होता है ।

व्यवहारविदः प्राज्ञा वृत्तशीलगुणान्विताः ।
रिपौ मित्रे समा ये च धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ॥ १६७ ॥
निरालसा जितक्रोधकामलोभाः प्रियंवदाः ।
सभ्याः सभासदः कार्या वृद्धाः सर्वासु जातिषु ॥ १६८ ॥

**सभासद् के लक्षण—**जो लोक-व्यवहार को जाननेवाले, विद्वान, सदाचार तथा सौजन्यादि एवं दया-उदारता आदि सद्गुणों से युक्त, शत्रु तथा मित्र में समभाव रखनेवाले, धर्मज्ञ, सत्यवादी, आलस्यरहित, क्रोध, काम तथा लोभ को जीतनेवाले ऐसे सभी जातियों के जो वृद्ध लोग हैं, उन्हें सभा का सभ्य ( मेम्बर ) बनाना चाहिये ।

सर्वभूतात्मतुल्यो यो निःस्पृहोऽतिथिपूजकः ।
दानशीलश्च यो नित्यं स वै सत्राधिपः स्मृतः ॥ १६६ ॥

**सत्राधिप के लक्षण—**जो सम्पूर्ण प्राणियों के साथ अपने समान व्यवहार

६ शु०