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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 16 of 526

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Page 16

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ग्रन्थों में भी इसी का समर्थन किया गया है। अतः यह स्पष्ट है कि प्रापणार्थक नीति का कर्त्ता है (प्रधानतः) राजा।

उपर्युक्त विवरण से यह सिद्ध होता है कि यतः राजा का ही यह 'नीति' कर्त्तव्य है अतः इस 'नीति' को 'राज-नीति' या 'राज-धर्म' भी कहा जा सकता है। इस प्रसङ्ग में 'धर्म' शब्द का अर्थ है 'कर्त्तव्य'¹।

यहाँ यह भी विचारणीय है कि 'नीति' शब्द के अर्थ के प्रसङ्ग में कहे गए अनुचित मार्ग में अनौचित्य का क्या अर्थ है। एक अनुचित तो वह है जो जिसके लिए विहित नहीं है पर अन्य के लिए विहित है। उदाहरणार्थ, हम तपस्या को ले सकते हैं। यह बहुत ही प्रशस्त आचरण है परन्तु शूद्र के लिए अनुचित है। दूसरे प्रकार का अनुचित उसे कहा जा सकता है जो सर्वथा प्रतिषिद्ध है, जैसे—चौर्य, परदाराभिगमन आदि। अनुचित मार्ग के अनुसरण के भी साधारणतः दो कारण होते हैं—अज्ञान तथा आसक्ति। सज्जन तथा दुर्जन दोनों ही कुमार्ग का अवलम्बन कर सकते हैं पर दोनों के अवलम्बन के आधार भिन्न-भिन्न होते हैं। सज्जन के अनुचित मार्गावलम्बन का आधार है 'अज्ञान' जब कि दुर्जन के प्रसङ्ग में यह आधार है 'आसक्ति'। यदि 'आसक्ति' से किसी भी व्यक्ति की प्रवृत्ति अनुचित मार्ग पर होती है तो उसे सज्जन कथमपि नहीं कहा जा सकता है और इसी तरह यदि 'अज्ञान' से किसी की प्रवृत्ति अनुचित मार्ग की ओर हो जाती है तो उस प्रवृत्ति के आधार पर उसे दुर्जन भी नहीं कहा जा सकता। संक्षेप में अनौचित्य का विवरण यही है।

उपर्युक्त अनौचित्य के अवरोध के लिए राजा को उपायों का आश्रयण करना पड़ता है। मनु,² याज्ञवल्क्य³ आदि के अनुसार ये उपाय चार हैं—साम, दान, भेद तथा दण्ड। मत्स्य-पुराण⁴ के अनुसार इन चार उपायों के अतिरिक्त भी तीन उपाय हैं—उपेक्षा, माया तथा इन्द्रजाल। यद्यपि ये उपाय प्रधानतः शत्रु-राजाओं के वशीकरण के लिए उपयोगी बतलाए गये हैं तथापि


१. धर्म-शब्दश्च कर्त्तव्यता-वचनः—मेधातिथि,
धर्म-शब्दोऽत्र दृष्टाऽदृष्टार्थानुष्ठेय-परः—कुल्लूकभट्ट । म० स्मृ० ७।१ ॥
२. सामादीनामुपायानां चतुर्णाम्—म० स्मृ० ७।१०९ ॥
३. उपायाः साम दानं च भेदो दण्डस्तथैव च ॥ या० स्मृ० १।३४६ ॥
४. साम भेदः तथा दानम् दण्डश्च मनुजेश्वर ।
उपेक्षा च तथा माया इन्द्रजालं तथैव च ॥ म० पु० २२१।२ ॥