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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 14 of 526

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Page 14

( १२ )

कौटिल्य चार विद्याओं को मानते हैं—आन्वीक्षिकी,^१ त्रयी (ऋग्, यजुः, साम) वार्त्ता तथा दण्ड-नीति। कामन्दक^२ तथा महाभारत^३ के आधार पर भी यह मत प्रमाणित है। मानव-सम्प्रदाय के अनुसार त्रयी,^४ वार्त्ता तथा दण्ड-नीति ये तीन ही विद्याएँ हैं। इस परम्परा का संकेत रामायण^५ में भी मिलता है। वृहस्पति-सम्प्रदाय का कथन है कि केवल दो ही विद्याएँ हैं वार्त्ता तथा^६ दण्ड-नीति। परन्तु शुक्राचार्य के अनुसार एक ही^७ विद्या है—दण्ड-नीति। (यह दण्ड-नीति नीति-विद्या का ही पर्याय है—यह बात आगे बतलाई जायगी।) इस सम्प्रदाय का कहना है कि दण्ड-नीति के बिना किसी भी विद्या की सुरक्षा नहीं हो सकती है। अतः सभी विद्याओं में प्रधान यही है। यह विद्या स्वतः पूर्ण है जब कि अन्यान्य विद्याएँ अपूर्ण अर्थात् आंशिक^८ हैं। यही कारण है कि चार विद्याओं के समर्थक कौटिल्य ने भी इसे सर्वोच्च स्थान^९ दिया है। छान्दोग्य उपनिषद् में प्रयुक्त 'एकायन' शब्द की व्याख्या शंकराचार्य ने की है—एकायनम्^१० = नीति-शास्त्रम्। इस एकायन शब्द से भी यही सिद्ध होता है कि यह नीति-विद्या सभी विद्याओं में श्रेष्ठ है। महाभारत आदि ग्रन्थों में इसी कारण से इस विद्या की भूयो-भूयः प्रशंसा की गई है। अतः यह स्पष्ट है कि नीति-विद्या सभी विद्याओं का मूल अतएव सर्व-श्रेष्ठ विद्या है।


१. आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता दण्ड-नीतिश्चेति......चतस्रः एव विद्याः इति कौटिल्यः। अ० शा०, पृ० १० (चौखम्बा)
२. आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता दण्ड-नीतिश्च शाश्वती।
विद्याश्चतस्र एवैताः लोक-संस्थिति-हेतवः ॥ का० नी० २।२ ॥
३. चातुर्विद्यञ्च कीर्तितम्—म० भा० (शान्ति-पर्व) ५१।४० ॥
४. त्रयी वार्त्ता दण्ड-नीतिश्चेति मानवाः। अ० शा०, पृ० १० ॥
५. विद्याः तिस्रश्च राघव। वाल्मीकि रामायण (अयो०का०) १००।६८ ॥
६. वार्त्ता दण्ड-नीतिश्चेति बार्हस्पत्याः। अ० शा०, पृ० १० ॥
७. दण्ड-नीतिरेका विद्या इत्यौशनसाः। तस्यां हि सर्व-विद्यारम्भाः प्रतिबद्धाः। अर्थ-शास्त्र, पृ० १० ॥
८. क्रियैक-देश-बोधीनि शास्त्राण्यन्यानि सन्ति हि।
सर्वोपजीवकं लोक-स्थितिकृन्नीति-शास्त्रकम्।
धर्मार्थ-काम-मूलं हि स्मृतं मोक्ष-प्रदं यतः ॥ शु० नी० सा० १।४-५ ॥
९. तस्यामायत्ता लोक-यात्रा। अ० शा०, पृ० १६ ॥
१०. छा० उ० ७।१।२ पर शा० भा० ॥