शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context| ४८ | शुक्रनीतिः |
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२-३ रसों से युक्त, तथा हीन एवं अधिक रसों से युक्त और कड़ु, मधुर तथा क्षार से युक्त अन्न नहीं भोजन करना चाहिये।
आवेदयति यत्कार्यं शृणुयान्मन्त्रिभिः सह ।
आरामादौ प्रकृतिभिः स्त्रीभिश्च नटगायकैः ॥ ३३० ॥
विहरेत्सावधानस्तु मागधैरिन्द्रजालिकैः ।
और यदि कोई किसी कार्य के लिये निवेदन करे तो राजा मन्त्रियों के साथ उसे सुने। और बगीचा आदि में प्रकृति (मन्त्री आदि), स्त्री, नट, गवैया, मागध (राजा की वंशावली के वर्णन करनेवाले), इन्द्रजाल विद्या के ज्ञाता (जादूगर) इन सबों के साथ विहार करे।
गजाश्वरथयानं तु प्रातः सायं सदाऽभ्यसेत् ॥ ३३१ ॥
व्यूहाभ्यासं सैनिकानां स्वयं शिक्षेच्च शिक्षयेत् ।
राजा प्रातः तथा सन्ध्या समय में हाथी, घोड़े तथा रथ की सवारी का प्रतिदिन अभ्यास करे। और सैनिकों को व्यूहाभ्यास (व्यूह-रचना का अभ्यास = कवायद्) करावे और स्वयं करे।
व्याघ्रादिभिर्वनचरैर्मयूराद्यैश्च पक्षिभिः ॥ ३३२ ॥
क्रीडयेन्मृगयां कुर्याद् दुष्टसत्त्वानिपातयन् ।
मृगया-व्यापार (शिकार खेलने) का वर्णन—राजा व्याघ्र आदिक, वनचर (कोल्ह-सिंहादि), मयूर आदि पक्षियों के साथ क्रीडा करे और दुष्ट हिंस्र जीवों को मारता हुआ शिकार खेले।
शौर्यं प्रवर्धते नित्यं लक्ष्यसन्धानमेव च ॥ ३३३ ॥
अकातरत्वं शस्त्रास्त्रशीघ्रपातनकारिता ।
मृगयायां गुणा एते हिंसादोषो महत्तरः ॥ ३३४ ॥
शिकार खेलने से नित्य शूरता बढ़ती है। निशाना ठीक होता है। कायरता नहीं रहने पाती है। एवं शस्त्रास्त्र को शीघ्र चलाने का अभ्यास होता है। शिकार खेलने में ये सब गुण हैं किन्तु एक हिंसारूपी सबसे महान दोष है।
इङ्गितं चेष्टितं यत्नात्प्रजानामधिकारिणाम् ।
प्रकृतीनां च शत्रूणां सैनिकानां मतं च यत् ॥ ३३५ ॥
सभ्यानां बान्धवानां च स्त्रीणामन्तःपुरे च यत् ।
शृणुयाद् गूढचारेभ्यो निशि चात्ययिके सदा ॥ ३३६ ॥
सावधानमनाः सिद्धशस्त्रास्त्रः संलिखेच्च तत् ।
राजा यत्नपूर्वक प्रजाओं तथा अधिकारियों के इङ्गित तथा चेष्टा को, एवं प्रकृति (अमात्यादि), शत्रु, सैनिक, सभासद्, बान्धव और अन्तःपुर (रनिवास) में