शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context४० शुक्रनीतिः
आदि डालकर मरम्मत कराते रहना चाहिये। राजा इसे ग्रामवालों से या कैदियों से ठीक करावे।
ग्रामद्वयान्तरे चैव पान्थशाला प्रकल्पयेत् ॥ २६९ ॥
नित्यं सम्मार्जितां चैव ग्रामपैश्च सुगोपिताम् ।
तत्रागतं तु संपृच्छेत्पान्थं शालाधिपः सदा ॥ २७० ॥
प्रयातोसि कुतः कस्मात्क गच्छसि ऋतंवद ।
ससहायोऽसहायो वा सशस्त्रः किं सवाहनः ॥ २७१ ॥
का जातिः किं कुलं नाम स्थितिः कुत्रास्ति ते चिरम् ।
इति पृष्ट्वा लिखेत्सायं शस्त्रं तस्य प्रगृह्य च ॥ २७२ ॥
सावधानमना भूत्वा स्वापं कुर्विति शासयेत् ।
तत्रस्थान्गणयित्वा तु शालाद्वारं पिधाय च ॥ २७३ ॥
संरक्षयेद्यामिकैश्च प्रभाते तान् प्रबोधयेत् ।
शस्त्रं दद्याच्च गणयेद् द्वारमुद्घाट्य मोचयेत् ॥ २७४ ॥
कुर्यात्सहायं सीमान्तं तेषां । ग्राम्यजनस्सदा ।
धर्मशाला की व्यवस्था— और दो ग्रामों के बीच में १ धर्मशाला बनवानी चाहिये जिसकी नित्य सफाई और रक्षा का प्रबन्ध ग्राम के जमीनदार या मुखिया के द्वारा होनी चाहिये। धर्मशाला का प्रबन्धक वहां ठहरे हुये यात्री से यह पूछे कि—यह सच बताओ कि—तुम कहां से आये हो ? क्यों आये हो ? और कहां जा रहे हो ? क्या तुम्हारे कोई साथी है या अकेले हो ? क्या शस्त्र या सवारी कोई तुम्हारे पास है ? तुम्हारी कौन जाति है ? तुम किस वंश के हो ? तुम्हारा क्या नाम है ? तुम अधिकतर कहां रहते हो अर्थात् तुम्हारा गृह कहां है। ये सब बातें सायंकाल को पूछ कर लिखे और यात्रियों के शस्त्र को अपने पास रख सावधान-मन होकर 'शयन करो' ऐसा कहकर यात्रियों पर शासन रखे। एवं वहां पर आये हुये यात्रियों की सायंकाल में गणना कर धर्मशाला के प्रधान द्वार को बन्द कर चौकीदारों से रात्रिभर रक्षा करावे। और प्रातःकाल यात्रियों को जगावे एवं उनके शस्त्रों को लौटाकर पुनः यात्रियों की गणना करे और फाटक खोलकर उन्हें बाहर कर दे। और ग्राम के लोग सीमा तक जाकर यात्रियों की सदा रक्षा करें।
प्रकुर्याद्दिनकृत्यं तु राजधान्यां वसन्नृपः ॥ २७५ ॥
उत्थाय पश्चिमे यामे मुहूर्तद्वितयेन वै ।
नियतायश्च कत्यस्ति व्ययश्च नियतः कति ॥ २७६ ॥
कोशभूतस्य द्रव्यस्य व्ययः कति गतस्तथा ।
व्यवहारे मुद्रितायव्ययशेषं कतीति च ॥ २७७ ॥