शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextप्रथमोऽध्यायः ३३
गढी से युक्त, मजबूत मन्दिर, मठ, धर्मशाला से सुशोभित ऐसी राजधानी
बनाकर राजा उसमें प्रजासहित सुरक्षित रह कर निवास करे ।
राजगृहं सभामध्यं गवाश्वगजशालिकम् ।
प्रशस्तवापीकूपादिजलयन्त्रैः सुशोभितम् ॥ २१८ ॥
सर्वतः स्यात्समभुजं दक्षिणोच्चमुदङ्नतम् ।
शालां विना नैकभुजं तथा विषमबाहुकम् ॥ २१९ ॥
प्रायः शाला नैकभुजा चतुःशालं बिना शुभा ।
शस्त्रास्त्रधारिसंयुक्तप्राकारं सुष्ठु यन्त्रकम् ॥ २२० ॥
सत्रिकक्षचतुर्द्वारं चतुर्दिक्षु सुशोभनम् ।
दिवा रात्रौ सशस्त्रास्त्रैः प्रतिकक्षासु गोपितम् ॥ २२१ ॥
चतुर्भिः पंचभिः षड्भिर्यामिकैः परिवर्तकैः ।
नानागृहोपकार्यादृ्ट्रिसंयुतं कल्पयेत्सदा ॥ २२२ ॥
राजधानी में राजोचित विविध शालायें बनाने का निर्देश—और राज-
धानी में राजा का गृह ऐसा हो कि जिसके मध्य में सभामवन हो, और उसके
अन्दर गोशाला, अश्वशाला तथा गजशाला बनी हो, अच्छी बावड़ी, कूप आदि एवं
फुआरों से भलीभांति सुशोभित हो । और जिसके चारों भुज सम हों एवं जो
दक्षिण की तरफ ऊँचा और उत्तर की तरफ नीचा हो, जिसमें शाला के बिना
एक भुज तथा विषम भुज न हो । क्योंकि चतुःशाल ( जिसके चारो तरफ
गृह हों ) के बिना अन्य शाला एक भुज होने से शुभदायिका नहीं होती
है । शस्त्र तथा अस्त्र के धारण करनेवाले सैनिकों से युक्त, और अच्छे-अच्छे यन्त्रों
से युक्त परिखा तथा चहारदीवारी से घिरा, तीन कक्षायों एवं चारों दिशाओं में
४ द्वारों से युक्त, सुन्दर हो और जिसमें दिन-रात शस्त्रास्त्र-धारी प्रहर २ पर
बदलते हुये घूम २ कर पहरा देनेवाले ४, ५ या ६ चौकीदारों से प्रत्येक कक्षायें
सुरक्षित हों, सदा नाना प्रकार के गृह, तम्बू, शामियाना, अटारो से युक्त ऐसा
राजभवन सदा बनावें ।
वस्त्रादिमार्जनार्थं च स्नानार्थं यजनार्थकम् ।
भोजनार्थं च पाकार्थं पूर्वस्यां कल्पयेद् गृहम् ॥ २२३ ॥
और उसमें वस्त्र धोने के लिये और स्नान तथा यज्ञ करने के लिये एवं
भोजन खाने-पकाने के लिये पूर्व दिशा में गृहों का निर्माण करे ।
निद्रार्थं च विहारार्थं पानार्थं रोदनार्थकम् ।
धान्यार्थं घरटार्थं दासीदासार्थमेव च ॥ २२४ ॥
उत्सर्गार्थं गृहान्कुर्याद्दक्षिणस्यामनुक्रमात् ।
गोमृगोष्ट्रगजाद्यार्थे गृहान्प्रत्यक् प्रकल्पयेत् ॥ २२५ ॥
३ शु०