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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 114 of 526

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Page 114

२८ | शुक्रनीतिः

खनिः सर्वधनस्येयं देवदैत्यविमर्दिनी ।
भूम्यर्थे भूमिपतयः स्वात्मानं नाशयन्त्यपि ॥ १७९ ॥

यह पृथ्वी सब धनों की खान तथा देवता और दैत्यों का नाश कराने वाली है क्योंकि राजा लोग पृथ्वी के लिये अपने को भी नष्ट कर देते हैं ।

उपभोगाय च धनं जीवितं येन रक्षितम् ।
न रक्षिता तु भूर्येन किं तस्य धनजीवितैः ॥ १८० ॥

जिसने उपभोग करने के लिये अपने धन तथा जीवन की रक्षा की, किन्तु पृथ्वी की रक्षा नहीं की, उसके धन तथा जीवन से क्या है अर्थात् कुछ लाभ नहीं है।

न यथेष्टव्ययायालं संचिते नु धनं भवेत् ।
सदागमाद्विना कस्य कुबेरस्यापि नाञ्जसा ॥ १८१ ॥

चाहे वह कुबेर ही क्यों न हो किसी का भी संचित धन नित्य धनागम के बिना इच्छानुसार व्यय करने के लिये योग्य नहीं होता है अर्थात् एक दिन समाप्त हो जाता है । इसलिये पृथ्वी धन से बढ़कर अन्य कोई धन नहीं है ।

पूज्यस्त्वेभिर्गुणैर्भूषो न भूपः कुलसंभवः ।
न कुले पूज्यते यादृग्बलशौर्यपराक्रमैः ॥ १८२ ॥

इन पूर्वोक्त गुणों से ही राजा वस्तुतः पूज्य होता है, राजकुल में केवल उत्पन्न होने से नहीं, क्योंकि जैसी प्रतिष्ठा बल, शूरता और पराक्रम से होती है वैसी केवल कुल से राजा की प्रतिष्ठा नहीं होती ।

लक्षकर्षमितो भागो राजतो यस्य जायते ।
वत्सरे वत्सरे नित्यं प्रजानां त्वविपीडनैः ॥ १८३ ॥
सामंतः स नृपः प्रोक्तो यावल्लक्षत्रयावधि ।
तदूर्ध्वं दशलक्षांतो नृपो मांडलिकः स्मृतः ॥ १८४ ॥
तदूर्ध्वं तु भवेद्राजा यावद्विंशतिलक्ष्षकः ।
पंचाशल्लक्षपर्यन्तो महाराजः प्रकीर्तितः ॥ १८५ ॥

**राजा के सामन्तादि भेदों का निर्देश—**जिसके राज्य से प्रतिवर्ष बिना प्रजा को पीडित किये ही एक लक्ष (१०००००) रजत (चांदी का) कर्ष (रूपया) से लेकर ३ लक्ष तक वार्षिक कर (मालगुजारी) मिलता है वह राजा 'सामन्त' कहलाता है । उसके बाद १० लक्ष पर्यन्त वार्षिक कर मिलने से 'माण्डलिक' राजा और उसके बाद २० लक्षतक वार्षिक कर मिलने से 'राजा' कहलाता है एवं ५० लक्ष तक वार्षिक कर मिलने से 'महाराज' कहलाता है ।

ततस्तु कोटिपर्यतः स्वराट् सम्राट् ततः परम् ।