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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 112 of 526

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Page 112

२६ | शुक्रनीतिः

वरमाशीविषैः संगं कुर्यान्न त्वेव दुर्जनैः ॥ १६४ ॥
निःश्वास से निकले हुये विषाग्नि के धूम से धूमिल मुखवाले सर्पों का साथ रखना अच्छा है किन्तु दुर्जनों का साथ अच्छा नहीं है।

क्रियतेऽभ्यर्हणीयाय सुजनाय यथांऽजलिः ।
ततः साधुतरः कार्यो दुर्जनाय हितार्थिना ॥ १६५ ॥
हित चाहनेवाले व्यक्ति के लिये उचित है कि वह जिस प्रकार आदरणीय सज्जनों के लिये हाथ जोड़ता है उससे अधिक दुर्जन के लिये हाथ जोड़े अर्थात् सुजन से अधिक दुर्जन का संमान उसके प्रसन्नतार्थ करे ।

नित्यं मनोपहारिण्या वाचा प्रह्लादयेज्जगत् ।
उद्वेजयति भूतानि क्रूरवाग्धनदोऽपि सन् ॥ १६६ ॥
**मनोहर वचन बोलने का निर्देश—**नित्य मनोहर वचनों से जगत् को आनन्दित करना चाहिये । क्योंकि यदि धन देनेवाला कुबेर के समान भी हो किन्तु क्रूर वाणी बोलने से वह मनुष्यों को उद्विग्न ही करता है ।

हृदि विद्ध इवात्यर्थं यथा संतप्यते जनः ।
पीडितोऽपि हि मेधावी न तां वाचमुदीरयेत् ॥ १६७ ॥
पीडित होने पर भी बुद्धिमान व्यक्ति ऐसी वाणी न बोले जिससे सुनने वाला व्यक्ति हृदय में बाण से विद्ध हुये की भांति अत्यन्त छटपटाने लगे ।

प्रियमेवाभिधातव्यं नित्यं सत्सु द्विषत्सु वा ।
शिखीव केकां मधुरां वाचं ब्रूते जनप्रियः ॥ १६८ ॥
सज्जन अथवा दुर्जन सभी के साथ सदा मधुर वचन बोलना चाहिये, क्योंकि जो मनुष्य मयूर की भांति प्रिय वचन बोलता है वह जनप्रिय होता है ।

मदरक्तस्य हंसस्य कोकिलस्य शिखंडिनः ।
हरंति न तथा वाचो यथा वाचो विपश्चिताम् ॥ १६९ ॥
मद से युक्त हंस, कोकिल या मयूर की वाणी वैसा मनको नहीं हरण करती है जैसा अच्छे विद्वानों की वाणी ।

ये प्रियाणि प्रभाषंते प्रियमिच्छंति सत्कृतम् ।
श्रीमन्तो वंद्यचरिता देवास्ते नरविग्रहाः ॥ १७० ॥
जो लोग प्रिय वचन बोलते हैं और अपने प्रिय का सत्कार करना चाहते हैं, ऐसे प्रशंसनीय चरितवाले श्रीमान लोग मनुष्य रूप में देवता ही हैं ॥

नहीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
दया मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक् ॥ १७१ ॥
तीनों लोकों में ऐसा दूसरा कोई वशीकरण नहीं है जैसा कि—प्राणियों