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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

Page 784 of 2621

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Page 784

‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! धर्मके ज्ञाता पुरुष चारों आश्रमोंमें गार्हस्थ्यको ही श्रेष्ठ बतलाते हैं, फिर आप उसका परित्याग क्यों करना चाहते हैं?॥ २२ ॥

‘मैं शास्त्रज्ञान और जन्मजात अवस्था दोनों ही दृष्टियोंसे आपकी अपेक्षा बालक हूँ, फिर आपके रहते हुए मैं वसुधाका पालन कैसे करूँगा?॥ २३ ॥

‘मैं बुद्धि और गुण दोनोंसे हीन हूँ, बालक हूँ तथा मेरा स्थान आपसे बहुत छोटा है; अतः मैं आपके बिना जीवन-धारण भी नहीं कर सकता, राज्यका पालन तो दूरकी बात है॥ २४ ॥

‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! पिताका यह सारा राज्य श्रेष्ठ और निष्कण्टक है, अतः आप बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वधर्मानुसार इसका पालन कीजिये॥ २५ ॥

‘मन्त्रज्ञ रघुवीर! मन्त्रोंके ज्ञाता महर्षि वसिष्ठ आदि सभी ऋत्विज् तथा मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि सारी प्रकृतियाँ यहाँ उपस्थित हैं। ये सब लोग यहीं आपका राज्याभिषेक करें॥ २६ ॥

‘हमलोगोंके द्वारा अभिषिक्त होकर आप मरुद्गणोंसे अभिषिक्त हुए इन्द्रकी भाँति वेगपूर्वक सब लोकोंको जीतकर प्रजाका पालन करनेके लिये अयोध्याको चलें॥

‘वहाँ देवता, ऋषि और पितरोंका ऋण चुकायें, दुष्ट शत्रुओंका भलीभाँति दमन करें तथा मित्रोंको उनके इच्छानुसार वस्तुओंद्वारा तृप्त करते हुए आप ही अयोध्यामें मुझे धर्मकी शिक्षा देते रहें॥ २८ ॥

‘आर्य! आपका अभिषेक सम्पन्न होनेपर सुहृद्गण प्रसन्न हों और दुःख देनेवाले आपके शत्रु भयभीत होकर दसों दिशाओंमें भाग जायँ॥ २९ ॥

‘पुरुषप्रवर! आज आप मेरी माताके कलङ्कको धो-पोंछकर पूज्य पिताजीको भी निन्दासे बचाइये॥ ३० ॥

‘मैं आपके चरणोंमें माथा टेककर याचना करता हूँ। आप मुझपर दया कीजिये। जैसे महादेवजी सब प्राणियोंपर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आप भी अपने बन्धु-बान्धवोंपर कृपा कीजिये॥ ३१ ॥

‘अथवा यदि आप मेरी प्रार्थनाको ठुकराकर यहाँसे वनको ही जायँगे तो मैं भी आपके साथ जाऊँगा’॥ ३२ ॥

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