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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

Page 2539 of 2621

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Page 2539

सकती (इसलिये आप अवश्य कुम्भयोनि अगस्त्य ही हैं)॥ २२ ॥

‘सौम्य! विप्रवर! आपका कल्याण हो। आप मेरा उद्धार करनेके लिये मेरे इस आभूषणका दान ग्रहण करें और आपका कृपाप्रसाद मुझे प्राप्त हो॥ २३ ॥

‘ब्रह्मन्! ब्रह्मर्षे! यह दिव्य आभूषण सुवर्ण, धन, वस्त्र, भक्ष्य, भोज्य तथा अन्य नाना प्रकारके आभरण भी देता है॥ २४ ॥

‘मुनिश्रेष्ठ! इस आभूषणके द्वारा मैं समस्त कामनाओं (मनोवाञ्छित पदार्थों) और भोगोंको भी दे रहा हूँ। भगवन्! आप मेरे उद्धारके लिये मुझपर कृपा करें'॥ २५ ॥

स्वर्गीय राजा श्वेतकी यह दुःखभरी बात सुनकर मैंने उनका उद्धार करनेके लिये वह उत्तम आभूषण ले लिया॥ २६ ॥

ज्यों ही मैंने उस शुभ आभूषणका दान ग्रहण किया, त्यों ही राजर्षि श्वेतका वह पूर्व-शरीर (शव) अदृश्य हो गया॥ २७ ॥

उस शरीरके अदृश्य हो जानेपर राजर्षि श्वेत परमानन्दसे तृप्त हो प्रसन्नतापूर्वक सुखमय ब्रह्मलोकको चले गये॥ २८ ॥

काकुत्स्थ! उन इन्द्रतुल्य तेजस्वी राजा श्वेतने उस भूख-प्यासके निवारणरूप पूर्वोक्त निमित्तसे यह अद्भुत दिखायी देनेवाला दिव्य आभूषण मुझे दिया था॥ २९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अठहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७८॥