श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
by महर्षि वाल्मीकि
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Read in contextप्राप्त होने लगते हैं (क्योंकि उन दोनोंको अन्तिम दो वर्णोंका संसर्गजनित दोष प्राप्त हो जाता है)॥ २२ ॥
'तदनन्तर अधर्म अपने दूसरे चरणको पृथ्वीपर उतारता है। द्वितीय पैर उतारनेके कारण ही उस युगकी 'द्वापर' संज्ञा हो गयी है॥ २३ ॥
'पुरुषोत्तम! उस द्वापर नामक युगमें जो अधर्मके दो चरणोंका आश्रय है—अधर्म और अनृत दोनोंकी वृद्धि होने लगती है॥ २४ ॥
'इस द्वापरयुगमें तपस्यारूप कर्म वैश्योंको भी प्राप्त होता है। इस तरह तीन युगोंमें क्रमशः तीन वर्णोंको तपस्याका अधिकार प्राप्त होता है॥ २५ ॥
'तीन युगोंमें तीन वर्णोंका ही आश्रय लेकर तपस्यारूपी धर्म प्रतिष्ठित होता है; किंतु नरश्रेष्ठ! शूद्रको इन तीनों ही युगोंसे तपरूपी धर्मका अधिकार नहीं प्राप्त होता है॥ २६ ॥
'नृपशिरोमणे! एक समय ऐसा आयगा, जब हीन वर्णका मनुष्य भी बड़ी भारी तपस्या करेगा। कलियुग आनेपर भविष्यमें होनेवाली शूद्रयोनिमें उत्पन्न मनुष्योंके समुदायमें तपश्चर्याकी प्रवृत्ति होगी॥ २७ ॥
'राजन्! द्वापरमें भी शूद्रका तपमें प्रवृत्त होना महान् अधर्म माना गया है। (फिर त्रेताके लिये तो कहना ही क्या है?) महाराज! निश्चय ही आपके राज्यकी किसी सीमापर कोऽई खोटी बुद्धिवाला शूद्र महान् तपका आश्रय ले तपस्या कर रहा है, उसीके कारण इस बालककी मृत्यु हुऽई है॥ २८ १/२ ॥
'जो कोऽई भी दुर्बुद्धि मानव जिस किसी भी राजाके राज्य अथवा नगरमें अधर्म या न करने योग्य काम करता है, उसका वह कार्य उस राज्यके अनैश्वर्य (दरिद्रता)-का कारण बन जाता है और वह राजा शीघ्र ही नरकमें पड़ता है, इसमें संशय नहीं॥ २९-३० ॥
'इसी प्रकार जो राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, वह प्रजाके वेदाध्ययन, तप और शुभ कर्मोंके पुण्यका छठा भाग प्राप्त कर लेता है॥ ३१ ॥
'पुरुषसिंह! जो प्रजाके शुभ कर्मोंके छठे भागका उपभोक्ता है, वह प्रजाकी रक्षा कैसे नहीं करेगा? अतः आप अपने राज्यमें खोज कीजिये और जहाँ कोऽई दुष्कर्म दिखायी दे, वहाँ उसके रोकनेका प्रयत्न कीजिये॥ ३२ १/२ ॥