Skip to content
SarvaKosh
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

Page 2435 of 2621

Read in context
Page 2435

श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर भद्रने हाथ जोड़कर एकाग्रचित्त हो उन महाबाहु श्रीरामसे यह परम सुन्दर बात कही— ॥ १२ ॥

‘राजन्! सुनिये, पुरवासी मनुष्य चौराहोंपर, बाजारमें, सड़कोंपर तथा वन और उपवनमें भी आपके विषयमें किस प्रकार शुभ और अशुभ बातें कहते हैं? यह बता रहा हूँ॥ १३ ॥

‘वे कहते हैं ‘श्रीरामने समुद्रपर पुल बाँधकर दुष्कर कर्म किया है। ऐसा कर्म तो पहलेके किन्हीं देवताओं और दानवोंने भी नहीं सुना होगा॥ १४ ॥

‘श्रीरामद्वारा दुर्धर्ष रावण सेना और सवारियोंसहित मारा गया तथा राक्षसोंसहित रीछ और वानर भी वशमें कर लिये गये॥ १५ ॥

‘परंतु एक बात खटकती है, युद्धमें रावणको मारकर श्रीरघुनाथजी सीताको अपने घर ले आये। उनके मनमें सीताके चरित्रको लेकर रोष या अमर्ष नहीं हुआ॥ १६ ॥

‘उनके हृदयमें सीता-सम्भोगजनित सुख कैसा लगता होगा? पहले रावणने बलपूर्वक सीताको गोदमें उठाकर उनका अपहरण किया था, फिर वह उन्हें लङ्कामें भी ले गया और वहाँ उसने अन्तःपुरके क्रीडा-कानन अशोकवनिकामें रखा। इस प्रकार राक्षसोंके वशमें होकर वे बहुत दिनोंतक रहीं तो भी श्रीराम उनसे घृणा क्यों नहीं करते हैं। अब हमलोगोंको भी स्त्रियोंकी ऐसी बातें सहनी पड़ेंगी; क्योंकि राजा जैसा करता है, प्रजा भी उसीका अनुकरण करने लगती है’॥ १७—१९ ॥

‘राजन्! इस प्रकार सारे नगर और जनपदमें पुरवासी मनुष्य बहुत-सी बातें कहते हैं’॥ २० ॥

भद्रकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने अत्यन्त पीड़ित होकर समस्त सुहृदोंसे पूछा— ‘आपलोग भी मुझे बतावें, यह कहाँतक ठीक है’॥ २१ ॥

तब सबने धरतीपर मस्तक टेककर श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके दीनतापूर्ण वाणीमें कहा— ‘प्रभो! भद्रका यह कथन ठीक है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है’॥

सबके मुखसे यह बात सुनकर शत्रुसूदन श्रीरामने तत्काल उन सब सुहृदोंको विदा कर दिया॥ २३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर भद्र हाथ जोड़कर बोला— ‘महाराज! आजकल पुरवासियोंमें आपको लेकर सदा अच्छी ही चर्चाएँ चलती हैं’॥ ७ ॥