श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
by महर्षि वाल्मीकि
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Read in context‘विमानराज पुष्पक! यदि ऐसी बात है तो मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ। कुबेरकी अनुकूलता होनेसे हमें मर्यादाभङ्गका दोष नहीं लगेगा’॥ १२ ॥
ऐसा कहकर महाबाहु श्रीरामने लावा, फूल, धूप और चन्दन आदिके द्वारा पुष्पकका पूजन किया॥ १३ ॥
और कहा—‘अब तुम जाओ। जब मैं स्मरण करूँ, तब आ जाना। आकाशमें रहना और अपनेको मेरे वियोगसे दुःखी न होने देना (मैं यथासमय तुम्हारा उपयोग करता रहूँगा)। स्वेच्छासे सम्पूर्ण दिशाओंमें जाते समय तुम्हारी किसीसे टक्कर न हो अथवा तुम्हारी गति कहीं प्रतिहत न हो’॥ १४½ ॥
पुष्पकने ‘एवमस्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर ली। इस प्रकार श्रीरामने उसका पूजन करके जब उसे जानेकी आज्ञा दे दी, तब वह पुष्पक वहाँसे अपनी अभीष्ट दिशाको चला गया॥ १५½ ॥
इस प्रकार पुण्यमय पुष्पकविमानके अदृश्य हो जानेपर भरतजीने हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीसे कहा—॥
‘वीरवर! आप देवस्वरूप हैं। इसीलिये आपके शासनकालमें मनुष्येतर प्राणी भी बारम्बार मनुष्योंके समान सम्भाषण करते देखे जाते हैं॥ १७½ ॥
‘राघव! आपके राज्यपर अभिषिक्त हुए एक माससे अधिक हो गया, तबसे सभी लोग नीरोग दिखायी देते हैं। बूढ़े प्राणियोंके पास भी मृत्यु नहीं फटकती है। स्त्रियाँ बिना कष्ट सहे प्रसव करती हैं। सभी मनुष्योंके शरीर हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते हैं॥ १८-१९ ॥
‘राजन्! पुरवासियोंमें बड़ा हर्ष छा रहा है। मेघ अमृतके समान जल गिराते हुए समयपर वर्षा करते हैं॥
‘हवा ऐसी चलती है कि इसका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है। राजन्! नगर और जनपदके लोग इस पुरीमें कहते हैं कि हमारे लिये चिरकालतक ऐसे ही प्रभावशाली राजा रहें’॥ २१½ ॥
भरतकी कही हुई ये सुमधुर बातें सुनकर नृपश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४१॥