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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

Page 2322 of 2621

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सत्रहवाँ सर्ग

रावणसे तिरस्कृत ब्रह्मर्षि कन्या वेदवतीका उसे शाप देकर अग्निमें प्रवेश करना और दूसरे जन्ममें सीताके रूपमें प्रादुर्भूत होना

(अगस्त्यजी कहते हैं—) राजन्! तत्पश्चात् महाबाहु रावण भूतलपर विचरता हुआ हिमालयके वनमें आकर वहाँ सब ओर चक्कर लगाने लगा॥ १ ॥

वहाँ उसने एक तपस्विनी कन्याको देखा, जो अपने अङ्गोंमें काले रंगका मृगचर्म तथा सिरपर जटा धारण किये हुए थी। वह ऋषिप्रोक्त विधिसे तपस्यामें संलग्न हो देवाङ्गनाके समान उद्दीप्त हो रही थी॥ २ ॥

उत्तम एवं महान् व्रतका पालन करनेवाली तथा रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित उस कन्याको देखकर रावणका चित्त कामजनित मोहके वशीभूत हो गया। उसने अट्टहास करते हुए-से पूछा— ॥ ३ ॥

‘भद्रे! तुम अपनी इस युवावस्थाके विपरीत यह कैसा बर्ताव कर रही हो? तुम्हारे इस दिव्य रूपके लिये ऐसा आचरण कदापि उचित नहीं है॥ ४ ॥

‘भीरु! तुम्हारे इस रूपकी कहीं तुलना नहीं है। यह पुरुषोंके हृदयमें कामजनित उन्माद पैदा करनेवाला है। अतः तुम्हारा तपमें संलग्न होना उचित नहीं है। तुम्हारे लिये हमारे हृदयसे यही निर्णय प्रकट हुआ है॥ ५ ॥

‘भद्रे! तुम किसकी पुत्री हो? यह कौन-सा व्रत कर रही हो? सुमुखि! तुम्हारा पति कौन है? भीरु! जिसके साथ तुम्हारा सम्बन्ध है, वह मनुष्य इस भूलोकमें महान् पुण्यात्मा है। मैं जो कुछ पूछता हूँ, वह सब मुझे बताओ। किस फलके लिये यह परिश्रम किया जा रहा है?’॥ ६ १/२ ॥

रावणके इस प्रकार पूछनेपर वह यशस्विनी तपोधना कन्या उसका विधिवत् आतिथ्य-सत्कार करके बोली—॥ ७ १/२ ॥

‘अमिततेजस्वी ब्रह्मर्षि श्रीमान् कुशध्वज मेरे पिता थे, जो बृहस्पतिके पुत्र थे और बुद्धिमें भी उन्हींके समान माने जाते थे॥ ८ १/२ ॥

‘प्रतिदिन वेदाभ्यास करनेवाले उन महात्मा पितासे वाङ्मयी कन्याके रूपमें मेरा प्रादुर्भाव हुआ था। मेरा नाम वेदवती है॥ ९ १/२ ॥