श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
by महर्षि वाल्मीकि
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Read in contextचौरासीवाँ सर्ग
विभीषणका श्रीरामको इन्द्रजित्की मायाका रहस्य बताकर सीताके जीवित होनेका विश्वास दिलाना और लक्ष्मणको सेनासहित निकुम्भिला-मन्दिरमें भेजनेके लिये अनुरोध करना
भ्रातृभक्त लक्ष्मण जब श्रीरामको इस प्रकार आश्वासन दे रहे थे, उसी समय विभीषण वानरसैनिकोंको अपने-अपने स्थानपर स्थापित करके वहाँ आये॥ १ ॥
नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण किये चार निशाचर वीर, जो काली कज्जल-राशिके समान काले शरीरवाले यूथपति गजराजोंके समान जान पड़ते थे, चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा कर रहे थे॥ २ ॥
वहाँ आकर उन्होंने देखा महात्मा लक्ष्मण शोकमें मग्न हैं तथा वानरोंके नेत्रोंमें भी आँसू भरे हुए हैं॥ ३ ॥
साथ ही इक्ष्वाकुकुलनन्दन महात्मा श्रीरघुनाथजीपर भी उनकी दृष्टि पड़ी, जो मूर्च्छित हो लक्ष्मणकी गोदमें लेटे हुए थे॥ ४ ॥
श्रीरामचन्द्रजीको लज्जित तथा शोकसे संतप्त देख विभीषणका हृदय आन्तरिक दुःखसे दीन हो गया। उन्होंने पूछा— ‘यह क्या बात है?’॥ ५ ॥
तब लक्ष्मणने विभीषणके मुँहकी ओर देखकर तथा सुग्रीव और दूसरे-दूसरे वानरोंपर दृष्टिपात करके आँसू बहाते हुए मन्दस्वरमें कहा—॥ ६ ॥
‘सौम्य! हनुमान्जीके मुँहसे यह सुनकर कि ‘इन्द्रजित्ने सीताजीको मार डाला’ श्रीरघुनाथजी तत्काल मूर्च्छित हो गये हैं’॥ ७ ॥
इस प्रकार कहते हुए लक्ष्मणको विभीषणने रोका और अचेत पड़े हुए श्रीरामचन्द्रजीसे यह निश्चित बात कही—॥ ८ ॥
‘महाराज! हनुमान्जीने दुःखी होकर जो आपको समाचार सुनाया है, उसे मैं समुद्रको सोख लेनेके समान असम्भव मानता हूँ॥ ९ ॥
‘महाबाहो! दुरात्मा रावणका सीताके प्रति क्या भाव है, यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ। वह उनका वध कदापि नहीं करने देगा॥ १० ॥