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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

Page 2037 of 2621

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Page 2037

उसका रथ आकाशमें खड़ा था और श्रीराम तथा लक्ष्मण युद्धभूमिमें विराजमान थे। उन दोनोंकी दृष्टिसे ओझल होकर वह राक्षस उन्हें पैने बाणोंसे बींधने लगा॥ २२ ॥

उसके बाणोंके वेगसे व्याप्त हुए श्रीराम और लक्ष्मणने भी अपने-अपने धनुषपर बाणोंका संधान करके दिव्य अस्त्र प्रकट किये॥ २३ ॥

उन महाबली बन्धुओंने सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणसमूहोंसे आकाशको आच्छादित करके भी इन्द्रजित्का अपने बाणोंसे स्पर्श नहीं किया॥ २४ ॥

उस तेजस्वी राक्षसने मायासे धूमजनित अन्धकारकी सृष्टि की और आकाशको ढक दिया। साथ ही कुहरेका अन्धकार फैलाकर दिशाओंको भी ढक दिया॥ २५ ॥

उसकी प्रत्यञ्चाकी टंकार नहीं सुनायी देती थी। पहियोंकी घर्घराहट तथा घोड़ोंकी टापकी आवाज भी कानोंमें नहीं पड़ती थी और सब ओर विचरते हुए उस राक्षसका रूप भी दृष्टिगोचर नहीं होता था॥ २६ ॥

महाबाहु इन्द्रजित् उस घने अन्धकारमें जहाँ दृष्टि काम नहीं करती थी, पत्थरोंकी अद्भुत वृष्टिके समान नाराच नामक बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ २७ ॥

समराङ्गणमें कुपित हुए उस रावणकुमारने वरदानमें प्राप्त हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा श्रीरामचन्द्रजीके सम्पूर्ण अङ्गोंमें घाव कर दिया॥ २८ ॥

जैसे दो पर्वतोंपर जलकी धाराएँ बरस रही हों, उसी प्रकार उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंपर नाराचोंकी मार पड़ने लगी। उसी अवस्थामें वे दोनों वीर भी सोनेके पंखोंसे सुशोभित तीखे बाण छोड़ने लगे॥ २९ ॥

वे कङ्कपत्रयुक्त बाण आकाशमें पहुँचकर रावणकुमार इन्द्रजित्को क्षत-विक्षत करके रक्तमें डूबे हुए पृथ्वीपर गिर पड़ते थे॥ ३० ॥

बाणसमूहोंसे अत्यन्त देदीप्यमान वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर अपने ऊपर गिरते हुए सायकोंको अनेक भल्ल मारकर काट गिराते थे॥ ३१ ॥

जिस ओरसे तीखे बाण आते दिखायी देते, उसी ओर वे दोनों भाई दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण अपने उत्तम अस्त्रोंको चलाया करते थे॥ ३२ ॥

अतिरथी वीर रावणपुत्र इन्द्रजित् अपने रथके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़ लगाता और बड़ी फुर्तीसे अस्त्र चलाता था। उसने अपने पैने बाणोंद्वारा उन दोनों दशरथकुमारोंको घायल