श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
by महर्षि वाल्मीकि
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Read in contextउसके वेगसे वहाँ बड़ी भारी ज्वाला जल उठी थी, मानो मेरु पर्वतके शिखरपर वज्रके आघातसे आग प्रकट हो गयी हो॥ ८८ ॥
कुम्भके द्वारा इस प्रकार आहत होनेपर वानरराज महाबली परम पराक्रमी सुग्रीवने भी अपना वज्रतुल्य मुक्का सँभाला और कुम्भकी छातीमें बलपूर्वक आघात किया। उस मुक्केका तेज सहस्रों किरणोंसे प्रकाशित सूर्यमण्डलके समान उद्दीप्त हो रहा था॥ ८९-९० ॥
उस प्रहारसे कुम्भको बड़ी पीड़ा हुई। वह व्याकुल हो बुझी हुई आगकी तरह गिर पड़ा॥ ९१ ॥
सुग्रीवके मुक्केकी चोट खाकर वह राक्षस आकाशसे अकस्मात् गिरनेवाले मंगलकी भाँति तत्काल धराशायी हो गया॥ ९२ ॥
मुक्केकी मारसे जिसका वक्षःस्थल चूर-चूर हो गया था, वह कुम्भ जब नीचे गिरने लगा, तब उसका रूप रुद्रदेवसे अभिभूत हुए सूर्यदेवके समान जान पड़ा॥ ९३ ॥
भयंकर पराक्रमी वानरराज सुग्रीवके द्वारा युद्धमें उस निशाचरके मारे जानेपर पर्वत और वनोंसहित सारी पृथ्वी काँपने लगी और राक्षसोंके हृदयमें अत्यन्त भय समा गया॥ ९४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७६ ॥
१. जिसका अग्रभाग नाईके छुरेके समान हो, उसे ‘क्षुर’ कहते हैं।
२. अर्द्धचन्द्राकार बाण।
३. पूर्णतः लोहेके बने हुए बाणका नाम ‘नाराच’ है। उसमें नीचेसे ऊपरतक सब-का-सब लोहा ही होता है।
४. बछड़ेके दाँतके समान जिसका अग्रभाग हो, उसे ‘वत्सदन्र्त’ कहा गया है।
५. जिसका मुखभाग कङ्क (वकविशेष)-की पाँखोंके समान हो, उस बाणको ‘शिलीमुख’ कहते हैं।
६. जिस बाणके दोनों पार्श्वभागोंमें कानका-सा आकार बना हो, वह ‘कर्णी’ कहलाता है।
७. जिसका फाल या अग्रभाग बड़ा हो, वह ‘शल्य’ है। किसी-किसीके मतमें आधे नाराजको ‘शल्य’ कहते हैं। ८. कनेरके पत्तेके अग्रभागके समान आकारवाले बाणका नाम ‘विपाठ’ है। (रामायणतिलकसे)