श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
by महर्षि वाल्मीकि
DevanagariHindipublished2,621 pages
Page 1942 of 2621
Read in contextPage 1942
महाकाय कुम्भकर्णने शूलकी ही भाँति अपने एक हाथमें विशाल परिघ भी ले रखा था। वह वानर-समूहोंको अत्यन्त घोर भय प्रदान करता हुआ प्रलय-कालमें संहारके साधनभूत कालदण्डोंसे युक्त भगवान् कालरुद्रके समान शत्रुओंका विनाश करनेके लिये पुरीसे बाहर निकला॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६५ ॥
* लंबाईका एक नाप। दोनों भुजाओंको दोनों ओर फैलानेपर एक हाथकी उँगलियोंके सिरेसे दूसरे हाथकी उँगलियोंके सिरेतक जितनी दूरी होती है, उसे ‘व्याम’ कहते हैं।