श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
by महर्षि वाल्मीकि
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Read in contextअपने तथा शत्रुपक्षके योद्धाओंको मारते हुए वानरों तथा राक्षसोंने उस रणभूमिको रक्तकी धारासे भिगो दिया और वहाँ कीच मचा दी॥ २३ १/२ ॥
तदनन्तर रक्तके प्रवाहसे सिंच जानेके कारण वहाँकी धूल बैठ गयी और सारी युद्धभूमि लाशोंसे भर गयी॥ २४ १/२ ॥
वानर और राक्षस एक-दूसरेपर वृक्ष, शक्ति, गदा, प्रास, शिला, परिघ और तोमर आदिसे बलपूर्वक जल्दी-जल्दी प्रहार करने लगे॥ २५ १/२ ॥
भयंकर कर्म करनेवाले वानर अपनी परिघके समान भुजाओंद्वारा पर्वताकार राक्षसोंके साथ युद्ध करते हुए रणभूमिमें उन्हें मारने लगे॥ २६ १/२ ॥
उधर राक्षसलोग भी अत्यन्त कुपित हो हाथोंमें प्रास और तोमर लिये अत्यन्त भयंकर शस्त्रोंद्वारा वानरोंका वध करने लगे॥ २७ १/२ ॥
इस समय अधिक रोषसे भरा हुआ राक्षस-सेनापति अकम्पन भी भयानक पराक्रम प्रकट करनेवाले उन सभी राक्षसोंका हर्ष बढ़ाने लगा॥ २८ १/२ ॥
वानर भी बलपूर्वक आक्रमण करके राक्षसोंके अस्त्र-शस्त्र छीनकर बड़े-बड़े वृक्षों और शिलाओंद्वारा उन्हें विदीर्ण करने लगे॥ २९ १/२ ॥
इसी समय वीर वानर कुमुद, नल, मैन्द और द्विविदने कुपित हो अपना परम उत्तम वेग प्रकट किया॥ ३० १/२ ॥
उन महावीर वानरशिरोमणियोंने युद्धके मुहानेपर वृक्षोंद्वारा खेल-खेलमें ही राक्षसोंका बड़ा भारी संहार किया। उन सबने नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा राक्षसोंको भलीभाँति मथ डाला॥ ३१-३२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५५ ॥