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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

Page 1763 of 2621

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Page 1763

‘शुक और सारण! जब तुम दोनों लङ्कामें पहुँचो, तब कुबेरके छोटे भाई राक्षसराज रावणको मेरी ओरसे यह संदेश सुना देना—॥ २२ ॥

‘रावण! जिस बलके भरोसे तुमने मेरी सीताका अपहरण किया है, उसे अब सेना और बन्धुजनोंसहित आकर इच्छानुसार दिखाओ॥ २३ ॥

‘कल प्रातःकाल ही तुम परकोटे और दरवाजोंके सहित लङ्कापुरी तथा राक्षसी सेनाका मेरे बाणोंसे विध्वंस होता देखोगे॥ २४ ॥

‘रावण! जैसे वज्रधारी इन्द्र दानवोंपर अपना वज्र छोड़ते हैं, उसी प्रकार मैं कल सबेरे ही सेनासहित तुमपर अपना भयंकर क्रोध छोड़ूँगा’॥ २५ ॥

भगवान् श्रीरामका यह संदेश पाकर दोनों राक्षस शुक और सारण धर्मवत्सल श्रीरघुनाथजीका ‘आपकी जय हो’, ‘आप चिरंजीवी हों’ इत्यादि वचनोंद्वारा अभिनन्दन करके लङ्कापुरीमें आकर राक्षसराज रावणसे बोले—॥

‘राक्षसेश्वर! हमें तो विभीषणने वध करनेके लिये पकड़ लिया था; किंतु जब अमित तेजस्वी धर्मात्मा श्रीरामने देखा, तब हमें छुड़वा दिया॥ २७ १/२ ॥

‘दशरथनन्दन श्रीराम, श्रीमान् लक्ष्मण, विभीषण तथा महेन्द्रतुल्य पराक्रमी महातेजस्वी सुग्रीव—ये चारों वीर लोकपालोंके समान शौर्यशाली, दृढ़ पराक्रमी और अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता हैं। जहाँ ये चारों पुरुषप्रवर एक जगह एकत्र हो गये हैं, वहाँ विजय निश्चित है। और सब वानर अलग रहें तो भी ये चार ही परकोटे और दरवाजोंके सहित सारी लङ्कापुरीको उखाड़कर फेंक सकते हैं॥ २८—३० १/२ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजीका जैसा रूप है और जैसे उनके अस्त्र-शस्त्र हैं, उनसे तो यही मालूम होता है कि वे अकेले ही सारी लङ्कापुरीका वध कर डालेंगे। भले ही वे बाकी तीन वीर भी बैठे ही रहें॥ ३१ १/२ ॥

‘महाराज! श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीवसे सुरक्षित वह वानरोंकी सेना तो समस्त देवताओं और असुरोंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय है॥ ३२ ॥

‘महामनस्वी वानर इस समय युद्ध करनेके लिये उत्सुक हैं। उनकी सेनाके सभी वीर योद्धा बड़े प्रसन्न हैं। अतः उनके साथ विरोध करनेसे आपको कोई लाभ नहीं होगा। इसलिये संधि कर लीजिये और श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें सीताको लौटा दीजिये’॥ ३३ ॥