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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

Page 1720 of 2621

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Page 1720

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सोलहवाँ सर्ग

रावणके द्वारा विभीषणका तिरस्कार और विभीषणका भी उसे फटकारकर चल देना

रावणके सिरपर काल मँडरा रहा था, इसलिये उसने सुन्दर अर्थसे युक्त और हितकर बात कहनेपर भी विभीषणसे कठोर वाणीमें कहा—॥ १ ॥

‘भाऽइ! शत्रु और कुपित विषधर सर्पके साथ रहना पड़े तो रह ले; परंतु जो मित्र कहलाकर भी शत्रु की सेवा कर रहा हो, उसके साथ कदापि न रहे॥ २ ॥

‘राक्षस! सम्पूर्ण लोकोंमें सजातीय बन्धुओंका जो स्वभाव होता है, उसे मैं अच्छी तरह जानता हूँ। जातिवाले सर्वदा अपने अन्य सजातियोंकी आपत्तियोंमें ही हर्ष मानते हैं॥ ३ ॥

‘निशाचर! जो ज्येष्ठ होनेके कारण राज्य पाकर सबमें प्रधान हो गया हो, राज्यकार्यको अच्छी तरह चला रहा हो और विद्वान्, धर्मशील तथा शूरवीर हो, उसे भी कुटुम्बीजन अपमानित करते हैं और अवसर पाकर उसे नीचा दिखानेकी भी चेष्टा करते हैं॥ ४ ॥

‘जातिवाले सदा एक-दूसरेपर संकट आनेपर हर्षका अनुभव करते हैं। वे बड़े आततायी होते हैं— मौका पड़नेपर आग लगाने, जहर देने, शस्त्र चलाने, धन हड़पने और क्षेत्र तथा स्त्रीका अपहरण करनेमें भी नहीं हिचकते हैं। अपना मनोभाव छिपाये रहते हैं; अतएव क्रूर और भयंकर होते हैं॥ ५ ॥

‘पूर्वकालकी बात है, पद्मवनमें हाथियोंने अपने हृदयके उद्गार प्रकट किये थे, जो अब भी श्लोकोंके रूपमें गाये और सुने जाते हैं। एक बार कुछ लोगोंको हाथमें फंदा लिये आते देख हाथियोंने जो बातें कही थीं, उन्हें बता रहा हूँ, मुझसे सुनो॥ ६ ॥

‘हमें अग्नि, दूसरे-दूसरे शस्त्र तथा पाश भय नहीं दे सकते। हमारे लिये तो अपने स्वार्थी जाति-भाऽइ ही भयानक और खतरेकी वस्तु हैं॥ ७ ॥

‘ये ही हमारे पकड़े जानेका उपाय बता देंगे, इसमें संशय नहीं; अतः सम्पूर्ण भयोंकी अपेक्षा हमें अपने जाति-भाइयोंसे प्राप्त होनेवाला भय ही अधिक कष्टदायक जान पड़ता है॥ ८ ॥

‘जैसे गौओंमें हव्य-कव्यकी सम्पत्ति दूध होता है, स्त्रियोंमें चपलता होती है और ब्राह्मणमें तपस्या रहा करती है, उसी प्रकार जाति-भाइयोंसे भय अवश्य प्राप्त होता है॥ ९ ॥