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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

Page 1712 of 2621

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Page 1712

‘राम मुझे एक बाणसे मारकर दूसरे बाणसे मारने लगेंगे, उसी बीचमें मैं उनका खून पी लूँगा। इसलिये तुम पूर्णतः निश्चिन्त हो जाओ॥ ३८॥

‘मैं दशरथनन्दन श्रीरामका वध करके तुम्हारे लिये सुखदायिनी विजय सुलभ करानेका प्रयत्न करूँगा। लक्ष्मणसहित रामको मारकर समस्त वानरयूथपतियोंको खा जाऊँगा॥ ३९॥

‘तुम मौजसे विहार करो। उत्तम वारुणीका पान करो और निश्चिन्त होकर अपने लिये हितकर कार्य करते रहो। मेरे द्वारा रामके यमलोक भेज दिये जानेपर सीता चिरकालके लिये तुम्हारे अधीन हो जायगी’॥ ४०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२॥


१. यहाँ रावणने सभासदोंके सामने अपनी झूठी उदारता दिखानेके लिये सर्वथा असत्य कहा है। सीताजीने कभी अपने मुँहसे यह नहीं कहा था कि ‘मुझे एक वर्षका समय दो। यदि उतने दिनोंतक श्रीराम नहीं आये तो मैं तुम्हारी हो जाऊँगी।’ सीताने तो सदा तिरस्कारपूर्वक उसके जघन्य प्रस्तावको ठुकराया ही था। इसने स्वयं ही अपनी ओरसे उन्हें एक वर्षका अवसर दिया था। (देखिये अरण्यकाण्ड सर्ग ५६ श्लोक २४-२५)
२. कुमार कार्तिकेयने अपनी शक्तिके द्वारा क्रौञ्चपर्वतको विदीर्ण करके उसमें छेद कर दिया था—यह प्रसंग महाभारतमें आया है। (देखिये शल्य प० ४६। ८४)