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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

Page 1323 of 2621

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Page 1323

देखकर और विदेहकुमारीका दर्शन किये बिना ही हमें लौटा हुआ जानकर श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेकी इच्छासे सुग्रीव हमें मरवा डालेंगे, इसमें संशय नहीं है॥ २१-२२ ॥

‘अतः अपराधी पुरुषोंका स्वामीके पास लौटकर जाना कदापि उचित नहीं है। हम सुग्रीवके प्रधान सहयोगी या सेवक होनेके कारण इधर उनके भेजनेसे आये थे॥ २३ ॥

‘यदि यहीं सीताका दर्शन करके अथवा उनका समाचार जानकर वीर सुग्रीवके पास नहीं जायेंगे तो अवश्य ही हमें यमलोकमें जाना पड़ेगा’॥ २४ ॥

भयसे पीड़ित हुए उन वानरोंका यह वचन सुनकर तारने कहा—‘यहाँ बैठकर विषाद करनेसे कोई लाभ नहीं है। यदि आपलोगोंको ठीक जँचे तो हम सब लोग स्वयंप्रभाकी उस गुफामें ही प्रवेश करके निवास करें॥ २५ ॥

‘यह गुफा मायासे निर्मित होनेके कारण अत्यन्त दुर्गम है। यहाँ फल-फूल, जल और खाने-पीनेकी दूसरी वस्तुएँ भी प्रचुर मात्रामें उपलब्ध हैं। अतः उसमें हमें न तो देवराज इन्द्रसे, न श्रीरामचन्द्रजीसे और न वानरराज सुग्रीवसे ही भय है’॥ २६ ॥

तारकी कही हुई पूर्वोक्त बात, जो अङ्गदके भी अनुकूल थी, सुनकर सभी वानरोंको उसपर विश्वास हो गया। वे सब-के-सब बोल उठे—‘बन्धुओ! हमें वैसा कार्य आज ही अविलम्ब करना चाहिये, जिससे हम मारे न जायँ’॥ २७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५३ ॥