शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in context७२ : शिवसूत्र विमर्श
अर्थ—जैसे अग्नि अत्यन्त प्रज्ज्वलित होकर बहुत ही निर्मल दीप्तिमय बनकर फिर
उस काष्ठ में (जो जला होता है) प्रवेश नहीं करती, वैसे ही योगी संसार के छः अध्वा से
उठा होता है । वह मल, कर्म और छः कञ्चुकों से निर्मल होकर लेपरहित होता है ।
अत्यन्त निर्मल (पवित्रतम) चैतन्यरूप होने से वह शरीर आदि में प्रारब्ध के समाप्त
होने तक ठहरा हुआ भी कर्मादि से बाधित नहीं होता ।
सूत्र में 'भूयः स्यात्' का यह भी आशय है कि योगी का शिवत्व कुछ नया नहीं
है जिसका पहले अभाव था। शिवता तो आत्मा का स्वभाव ही है (चैतन्यमात्मा—१-१)।
अतः वह केवल मायाशक्ति से उत्पन्न अपने विकल्प के दुर्भाव से भासमान शिवता
का विमर्श भी नहीं करता । वह स्वरूप-साक्षात्मय होता है । जगदानन्द दशा में वह
जीवन्मुक्त है ॥४५॥
इस प्रकार शिवसूत्र का आणवोपाय
प्रकाशन नामक तीसरा विकास
समाप्त हुआ
शुभं भवतु सर्वेषाम्
शिवसूत्रसार
मोहशान्तौ सकलकलना शान्तिमेति चिराय
पूर्णा संवित् स्वरसरसिका स्वानुभूत्यैव सम्यक् ।
शैवं धाम भजति सहसा निर्वृ ताऽनन्तवृत्त्या
यस्मात् स्पृष्ट्वा स्वतनग्विभवं धामगर्भं तनोति ॥
अविद्यारूप माया-मोह के शमन होने पर विज्ञानाकल प्रमाता की अवस्था में
अन्तर्मुख और बहिर्मुख होने की कल्पनाएँ सदा के लिए एक-सी बन कर शान्त
होती हैं ।
संवित्-देवी अन्तः और बाह्य अपने ही स्वाभाविक अनुभवों में चिदानन्द-रस का
आस्वादन करती है—शुद्धविद्या से शिवतत्त्व तक शिव की पाँच विभूतियों में पूर्णरूप से
आह्लादमय रहती है ।
वह अनन्यवृत्ति से नित्य-निरन्तर स्वरूपविमर्श-पूर्ण दशा में, शिव के शक्तिपात से,
क्षणमात्रसंभव पर-शिवधाम को भजती है जिसके स्पर्शमात्र से अपने ही अन्तरतम
स्वरूप की विभूति को विश्वरूपता में प्रकट करती है ।
अतः आत्मा का स्वरूप ज्ञानरूप क्रिया में स्वातन्त्र्य है—चैत्यमात्मा ॥
इति शिवम्