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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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तृतीय विकास : ६१
(च) रूप-विषय का अभ्यास—
आनन्दे महति प्राप्ते दृष्टे वा बान्धवे चिरात् ।
आनन्दमुद्गतं ध्यात्वा तन्मयस्तल्लयीभवेत् ॥
अर्थ—स्त्री आदि शक्ति के सम्मुख होने पर, दरिद्रता से पीड़ित किसी व्यक्ति को
अकस्मात् धन की बड़ी राशि मिलने पर अथवा बहुत समय के प्रवास से आए हुए
बन्धु, पुत्र, मित्र आदि से मिलने पर जो आनन्द का उदय होता है उसके उदयस्थान
मात्र का ग्रहण कर उसका अन्तर्मुख भाव में ध्यान करने से (योगी) आनन्द में
विश्राम पाये।
(छ) रसना-विषय का अभ्यास—
जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् ।
भावयेद्भरितावस्थां१ महानन्दस्ततो भवेत् ॥
अर्थ—क्षुधा के समय भक्ष्य (खाने के योग्य, अभक्ष्य नहीं) खाने पर और प्यास के
समय पेय (जल नींबू या मीठा क्षीर आदि, मद्य आदि नहीं) पीने पर प्रत्येक लुकमे और
प्रत्येक बूँद से जो तुष्टि, पुष्टि और क्षुधा-निवृत्ति के आनन्द का अनुभव होता है,
उस आनन्द दशा का विमर्शन करने से (योगी) स्वरूप-समावेशमय आनन्द से
भर जाता है ।
शब्द, स्पर्श आदि विषयों के उपभोग में वेद्यपदार्थ का विगलन होकर क्षणमात्र
संभव तुर्यपद के उदय होने पर भी साधारण जन असावधानी के कारण प्रत्यक्ष शब्दन,
स्पर्शन आदि विषय में ही सुख मानता है । परन्तु योगीजन मायाशक्ति से आच्छादित
होने पर भी उन विषयभोगों के अवसरों पर सावधान रहने से उस विद्युत् के समान
तुर्यरस से सींचता हुआ स्वरूप-विमर्श की स्थिति को दृढ़ करता है और तदनन्तर
ब्रह्मानन्द भाव का अनुभव निरन्तर करता है । श्रीमदाद्यशङ्कराचार्य इस विषय में
कहते हैं :
'आदौ ब्रह्माहमस्मीत्यनुभव उदिते खल्विदं ब्रह्म पश्चात् ।'
—(शतश्लोकी—३)
अर्थ—पहले जब 'मैं ब्रह्म हूँ' यह अनुभव उदित होता है उसके बाद यह बोध स्वयं
होता है कि यह जगत् आदि सब कुछ ब्रह्म है ।
अतः योगी प्रधान तुर्यामृत रस से जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं को सींचता है
और पूर्णहंता के स्वानुभव से आनन्दित होता है । यह अकिञ्चित्-चिन्तनमयी दशा
विश्व-अभेद-चमत्कार-मय होती है जहाँ अणुमात्र भी आणवमल नहीं रहता है। इस
विषय में भैरव देवी से कहता है :
१, पाठान्तर : 'भावयेद्भैरवम् भावम्' इति