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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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तृतीय विकास : ५१
सः- (वह)
च-निश्चय से
ज्ञाहेतुः - ज्ञानशक्ति के हेतु (अर्थात् शिष्यों को परमार्थज्ञान प्रदान करने से
अपने शिवस्वरूप की पहचान कराने में (समर्थ) होता है ।
व्याख्या - बहिर्मुख इन्द्रिय-वृत्तियों को 'अविप' कहते हैं। (अवीन् पशून् पाति इति
अविपं) जो पशुओं अर्थात् इन्द्रिय-वृत्तियों को पालती हैं, बहिर्मुख रहने की ओर सहा-
यता देती हैं महेश्वर की उन घोरतरी शक्तियों को 'अविप' कहते हैं। यह शक्तियां
योगी के शुद्धविद्या स्वरूप को किञ्चित् ढक लेती हैं। यह बात इसी विकास के १९वें
सूत्र में कही गई है-कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः (माहेश्वर्य आदि घोरतरी
शक्तियां बहिर्मुखता को प्राप्त हुई संवित्-मातृकाचक्र में पशुप्रमाता रूप अधिष्ठातृ
शक्तियां (इन्द्रिय-वृत्तियां) बनकर योगी को नीचे और नीचे गिराती हैं ।) यह शक्तियां
पशुओं (जीवों) को परमार्थ प्राप्त करने से रोकती हैं। अतः योगी इन पर 'यह सब
मेरा ही विभव है' इस स्वात्म ऐश्वर्य को पहचान कर प्रभुत्व जमाता है। जब उसका
प्रभुत्व इन्द्रिय-वृत्तियों पर आरूढ़ होता है तब वह निश्चय ही शिष्यों को स्वात्मा का
प्रत्यभिज्ञान कराने में समर्थ होता है। दूसरे जो शक्तिचक्र के अधीन रहें पशुभाव को
हटा नहीं सकते फिर तो शिष्यों को प्रबोध देने की बात ही क्या ! परन्तु जो योगी
अविपस्थ अर्थात् इन्द्रिय-वृत्तियों को वश में रखने वाला हो, वह अवश्य 'स्वयं तीर्त्वा
परान् तारयति' का प्रतीक बनता है। वह दूसरों को भी आत्मज्ञान के प्रबोध कराने
का हेतु बन जाता है। इसीलिए पूर्व-सूत्र में कहा है-
दानमात्मज्ञानम्-योगी का आत्मज्ञान-निष्ठ रहना ही उसका उत्तम दान है ।।२९।।
सम्बन्ध-क्योंकि
स्वशक्तिप्रचयोऽस्य विश्वम् ॥३०॥
विश्वम् - यह सारा विश्व
अस्य - इस शिवयोगी के
स्वशक्तिप्रचयः - अपने ही शक्तिचक्र (क्रियाशक्ति) का विकास है ।
व्याख्या -- यह सारा विश्व शिवयोगी के अपने शक्तिचक्र का समूह है क्योंकि
शिव का यह विश्व स्वशक्ति-मय है। कहा है :
'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः' ।।
अर्थ - यह सारा जगत् उसकी शक्तियों का ही समूह है क्योंकि महेश्वर ही
सर्वशक्तिमान् है ।
इस योगी के लिए जगत् वृत्तिरूप नहीं होता है। इस पद पर इंद्रिय-वृत्तियां योगी
की शक्तियां बन जाती हैं क्योंकि यह अन्तर्मुख पद पर ही ठहरती हैं। यह सृष्टि