शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in context३४ : शिवसूत्र विमर्श
जाग्रद् द्वितीयकरः ॥८॥
द्वितीयकरः—(शिवव्याप्ति की) दूसरी किरण
जाग्रत्—(वेद्यवर्ग को आभासन कराने वाली) जागरूकता है।
व्याख्या—सात्त्विक अर्थात् शुद्ध विद्या को प्राप्त करके उसके साथ एकाग्र वा साम-
रस्य होने को जागरूकता कहते हैं। पूर्ण विमर्शरूप अहंता का लाभ होने के बाद इदन्ता
का भी उसी भाव से विमर्श करना आवश्यक है। वही स्वरूप-परिपूर्णता है। अतः वेद्य-
वर्ग के आभासन में आने वाला जगत् इसकी दूसरी किरण है। विज्ञानभैरव में कहा है :
यत्र यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते विभोः ।
तस्य तन्मात्रधर्मित्वाच्चिल्लयाद्भूरितात्मता ॥ श्लोक ११७॥
अर्थ—जहाँ जहाँ परभैरवरूप चित्प्रकाश चक्षु आदि मार्ग से नील सुख आदि में
स्फुरित होता है वहाँ वहाँ चैतन्य के बिना कुछ और न होने के कारण वह नीलादि
चित्त में ही लीन होते हैं। यही साधक की परभैरवरूपता है।
सर्वमङ्गला-तन्त्र में कहा है :
शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमुच्यते ।
शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ॥
अर्थ—चित्स्वरूप की परिपूर्णता में शक्ति और शक्तिमान् (शिव) केवल दो पदार्थ
हैं। सारा जगत् तो उसकी शक्तियाँ हैं और शक्तिमान् स्वयं महेश्वर है ॥८॥
सम्बन्ध—इस प्रकार दोनों किरणों द्वारा स्वरूपविमर्शन से आविष्ट योगी के
आत्मा के बारे में कहते हैं।
नर्तक आत्मा ॥९॥
नर्तकः—विश्वनाटक का नट
आत्मा—(उसका) अपना आप है।
व्याख्या—अपने अन्तर में छिपाये हुए अपने शुद्ध स्वरूप की पकड़ के अनुसार
नाना अवस्थाओं का प्रपंच, अपने ही परिस्पन्द अर्थात् स्वातन्त्र्य शक्ति की क्रीड़ा से
अपनी ही भित्ति पर जो प्रकट करता है वह नट अपना आप है।
भगवान् उत्पल की प्रत्यभिज्ञा की टीका (जो अनुपलब्ध है) में यह बात स्पष्ट है :
“संसारनाट्यप्रवर्तयिता सुप्ते जगति जागरूक एक एव परमेश्वरः”
अर्थ—संसार नाटक को प्रवर्तन में लाने वाला एक परमेश्वर ही इस सोये हुए
जगत् में सजग है ॥९॥
सम्बन्ध—अब इस जगत्-नाटक में नर्तक (योगी) का नाट्य-स्थान बतलाते हैं।