Skip to content
SarvaKosh
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

Page 48 of 108

Read in context
Page 48

तृतीय विकास
अब आणवोपाय द्वारा शिवस्वरूप के आनन्दानुभव का वर्णन किया जाता है।
आणवोपाय का लक्षण मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में इस प्रकार वर्णित है :-
उच्चारकरणध्यानवर्णस्थानप्रकल्पनैः ।
यो भवेत्स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥
—(मा० वि० : अधिकार २ श्लोक २१)
अर्थ—प्राणादि पंच प्रवाहों द्वारा उच्चार से, मुद्रा से, ध्वन्याभ्यास से और कदली
सम्पुटाकार की तरह हृदयादि देश में धारणा से जो समावेश साधक को होता है उसे
आणवोपाय कहते हैं।
सम्बन्ध—यह साधारण जीवोपाय है। अणु का अर्थ है जीवात्मा। उसी से आणव
अर्थात् जीवात्मा सम्बन्धी अर्थ बनता है। अब आणवोपाय का वर्णन करने की इच्छा
से पहले अणु अर्थात् जीव का स्वरूप कहते हैं।
आत्मा चित्तम् ॥१॥
आत्मा—लगातार जन्म-जरादि में गमन करने वाला जीवात्मा
चित्तम्—विषय वासनाओं से रंगे हुए मन वाला है।
व्याख्या—'अत्' धातु सातत्य अर्थात् सतत गमन के अर्थ में लगता है। जो
लगातार गमनशील हो उसे आत्मा कहते हैं। जिस प्रकार परमात्मा तीनों कालों (भूत,
वर्तमान और भविष्य—स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति) में गमन करता है, अर्थात् एक
आत्मा संवित् रूप से स्वयं प्रभा है, उसी प्रकार जीवात्मा भी जन्म-जरादि (स्वप्न-
जाग्रदादि) में सत्त्व, रज, तम वृत्तियों से गमन करता रहता है। वही आत्मा मन अर्थात्
अन्तःकरण है जो सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण वृत्तियों (निश्चय, विकल्प और
अभिमान प्रधान) विषय-वासनाओं, प्रकाश (अविद्या सत्त्व विशेष), चंचलता और
आवरण से रंगा हुआ है। वही जीव अथवा अणु कहलाता है जो मन, बुद्धि, अहंकार
के व्यापार वाला चित्त है।
शाम्भवपरामर्श में यह आत्मा भाव और अभाव रूप जगत् के स्वभाव वाला ज्ञान-
रूप क्रिया में स्वतन्त्र है। बोधसुधाब्धि के साथ तादात्म्य होने के कारण आत्मा यहाँ
पूर्णाहन्ता में प्रवेश वाला है। चिदेकरूप आत्मा का यहाँ उत्क्रमण (अर्थात् जन्मान्तर