शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in context२२ : शिवसूत्र विमर्श
अर्थ—जब देह में आत्मा के अभिमान करने का 'अहं' पूर्णाहन्ता में लय हो जाये
तब योगी की प्रतिष्ठा परम पद में होती है ॥८॥
'सम्बन्ध—क्योंकि पूर्णता प्राप्त करने तक षट्-कञ्चुक इसके साथ हो रहते हैं अतः;
वही योगी:
ज्ञानमन्नम् ॥९॥
ज्ञानं—घटपटादि तथा रागद्वेषादि रूप भेदप्रथा के ज्ञान का
अन्नम्—ग्रास करने में (तत्पर रहता है) ।
व्याख्या—पहले विकास के दूसरे सूत्र-'ज्ञानं बन्धः' (द्वैतज्ञान ही बन्धन है)—के
अनुसार योगी द्वैतज्ञान को ग्रास करने में तत्पर रहता है। भेदज्ञान बाह्येन्द्रियों द्वारा
घटपटादि में होता है और अन्तःकरण द्वारा रागद्वेषादि में प्रकट होता है ! इस अवस्था
में यह भेदज्ञान ही योगी के ग्रास करने योग्य अन्न है। सब प्रकार की भेदप्रथा का वह
ग्रास करके अद्वयानन्द में मग्न रहता है। श्री भर्गशिखा शास्त्र में कहा है:—
'मृत्युं च कालं च कलाकलापं
विकारजातं प्रतिपत्तिसात्म्यम्।
ऐकात्म्यनानात्मविकल्पजातं
तदा स सर्वं कवलीकरोति ॥'
अर्थ—तब स्वरूप साक्षात्कार के समय वह महायोगी स्थूलदेह के विनाश, महाकाल,
क्रियासमूह, हासक्रोधादि द्वन्द्वविकार, भेदप्रथा के ज्ञान से तत्तत् भाव में तन्मय होना,
जीवों के साथ एकता और स्थाणु आदि के साथ नानात्व का विकल्प, इन सब को ग्रास
करता है।
ऐसे उदारचित्त योगिराजों का कुटुम्ब सारी सृष्टि है। कहा भी है : 'उदारचरि-
तानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्' ।
इस सूत्र का दूसरा अर्थ इस प्रकार है—
ज्ञानं—स्वरूप विमर्शरूप ज्ञान
अन्नम्—(योगी का) पोषक है।
व्याख्या—स्वरूपविमर्शरूप ज्ञान ऐसे महायोगी का अन्न है अर्थात् पूर्णरूप से
परितृप्त होने से यह स्वरूपज्ञान ही उसकी विश्रान्ति का कारण बन जाता है। इसमें
युक्ति प्राप्त करने के लिए श्रीविज्ञानभैरव में कथित एक सौ बारह (११२) धारणाएँ
सहायक बन सकती हैं। ऐसा योगी संकोचरहित स्वातन्त्र्यशक्तिसम्पन्न रहता है।
'स्पन्दशास्त्र में कहा है :—
“प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेत्…………”
अर्थ—स्वातन्त्र्यशक्ति सम्पन्न होने से वह महायोगी सदा स्वरूप ज्ञान में प्रबुद्ध
रहता है ॥९॥