शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in context१८ : शिवसूत्र विमर्श
व्याख्या—जो साधक ईश्वर-इच्छा से ही उस परप्रमातृभाव पर स्थिति प्राप्त
करने में असमर्थ होकर मार्ग के प्रलोभनों में ही रमता है उसका मन योगमाया भूमि
(छः मित-सिद्धियों) में प्रसन्न रहता है। यद्यपि उसे किञ्चित् ज्ञानलाभ होता भी है
तथापि वह अशुद्धविद्या (अर्थात् सर्व-जन-साधारण विद्या) के ही विशेष चमत्कारों में व्यस्त
रहता है और परलाभ से वञ्चित रहता है। उसकी समाधि-दशा वैसी ही भ्रमात्मक
है जैसे स्वप्न में पड़ा साधारण जीव । व्युत्थान दशा में वह यद्यपि इन मितसिद्धियों का
प्रदर्शन करता है परन्तु समाधि में उसे ये ही विघ्न बन जाती हैं। फलतः ऐसा साधक
स्वच्छन्द परमार्थ लाभ से वंचित रह जाता है। पातञ्जल योगदर्शन में कहा है—
'ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः'
—(३-२७)
अर्थ—वे छः प्रकार की मितसिद्धियाँ समाधि की सिद्धि अर्थात् ज्ञानप्राप्ति में
विघ्न हैं और व्युत्थान में सिद्धियाँ हैं।
ऐसे साधक की देहवासना छूटी नहीं होती है। इस कारण उसकी बिन्दु-नाद की
शक्तियों से उत्पन्न हुई मितसिद्धियाँ अस्थायी होती हैं और उसे क्षोभ में डालती
रहती हैं। अतः साधक को सचेत रहने की आवश्यकता है। यह सद्गुरु का कृपापात्र
बनकर रहने से ही हो सकता है ॥४॥
सम्बन्ध—परन्तु इन मितसिद्धियों के समीप आने पर भी जब योगी ईश्वरकृपा से
इनका आश्रय नहीं लेता है और परम स्थिति का ही आलम्बन धारण कर सकता है तो
वह परप्रमातृभाव की सहज-स्थिति को पाता है। इसके लिए अगला सूत्र कहा
गया है।
विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था ॥५॥
विद्यासमुत्थाने—पराद्वयप्रथारूप शुद्धविद्या का उदय
स्वाभाविके—स्वाभाविक (सहज) होने पर
खेचरी—चिदाकाशगामी खेचरी मुद्रा (में)
शिवावस्था—परसंविद्रूप शिव अवस्था (योगी को प्राप्त होती है)।
व्याख्या—अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल होने पर योगी शुद्धविद्या को पाता है। यहाँ
उसे परम अद्वैत-स्वरूप ज्ञान का उदय होता है। परमेश्वर की इच्छा मात्र से वह अनेक
जन्माजित पुण्य-पुञ्जों के फलस्वरूप पराद्वयस्वरूप में मज्जन करता है। यहाँ मित
सिद्धियों का अनादर होता है और समस्त मायीय भेद शान्त हो जाते हैं। योगी
बोधगगन में विचरण रूप खेचरी मुद्रा के आस्वादन में स्वाभाविकी स्थिति को प्राप्त
होता है। यह उसकी पराहंतारूप स्वानन्दपूरित शिवावस्था है। फिर यह स्वाभाविक
विद्यासमुत्थान उसे केवल अनुसंधान मात्र से होता है। श्रुति कहती है:—