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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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१६ : शिवसूत्र विमर्श
अर्थ—निद्रा के आरम्भ में और जाग्रत् के अन्त में जिस शुद्ध और निर्विषय भाव
का अनुभव होता है वह यदि अन्तःकरण में स्थिर हो जाये तो उससे अद्वयानन्द की
प्राप्ति होती है ।
प्राणापान-संघर्ष में दृढ़ाभ्यासी साधक को ब्रह्मवेग से (अर्थात् यह जानने के बिना कि
क्या होने वाला है) सूर्यकोटिसम-प्रभा (करोड़ों सूर्यों के प्रकाश के समान) प्रकाशरूप
आकारता का अनुभव होता है । यह पर-ज्ञानरूप नाद है । यही सूक्ष्म कुण्डलिनी का
जागरण है ।
पराशक्ति के उदर में बिन्दु (कुण्डलिनी) की चार कलायें हैं । वे इस प्रकार हैं :—
१. प्रमेय-प्रधान पहला वलय
२. प्रमाण-प्रधान दूसरा वलय
३. प्रमातृ-प्रधान तीसरा वलय
४. प्रमिति-प्रधान चौथा अर्धवलय
(यह परप्रमातृभावरूप अर्धवलय है)
इस प्रकार कुण्डलिनी के साढ़े तीन वलय हैं । प्राणापान संघर्ष के द्वारा पराशक्ति
जब दो बिन्दुओं अर्थात् मूलाधारचक्र और ब्रह्मारन्ध्र के मध्य सीधी रेखा का रूप धारण
करती है तो इसे ज्येष्ठा-शक्ति जानना चाहिये । इस दशा में यह शरीर-दशा से बाहर
व्याप्त होती है । यह योगी की समाधि-दशा है । यही इच्छा-ज्ञान-क्रिया रूप त्रिवेणी
तीर्थ है । यह प्रकाशरूप दशा वीर्य से प्राप्त होती है ।
सुप्त अवस्था में मोक्षमार्ग का निरोध करने के कारण इसे रौद्री-शक्ति कहते हैं ।
यह शक्ति मोह तथा विघ्न-बाधाओं के कारण साधक में पराशक्ति का विकास नहीं होने
देती । जब यह परा-शक्ति साधनाभ्यास के स्वाभाविक होने पर योगी की व्युत्थान दशा
में भी अन्तर्भूत रहती है तो यह शशाङ्कशकलाकार पूर्णानन्दमय अवस्था ही उसकी
पूर्णसिद्धि है । इसे अम्बिका-शक्ति कहते हैं ।
इस प्रकार एक ही पराशक्ति के त्रिविध रूप हैं । इन्हीं तीन शक्तियों से अ-क्ष
माला के नौ वर्ग उत्पन्न हुए । इनकी शक्तिदेवियाँ इस प्रकार हैं :—
१. अमा (अ-वर्ग), २. कामा (क-वर्ग), ३. चार्वङ्गी (च-वर्ग), ४. टङ्कधारिणी
(ट-वर्ग), ५ तारा (त-वर्ग), ६. पार्वती (प-वर्ग), ७. यक्षिणी (य-वर्ग), ८. शारिका
(श-वर्ग) और ९. क्षेमङ्करी (क्ष-वर्ग) । इसे नवार-चक्र कहते हैं ।
इन नौ वर्गों से पाँच मन्त्रदेवताओं का प्रादुर्भाव हुआ । वे इस तरह हैं :—
१. सद्योजात (इच्छा) इ प्रत्यवमर्शनरूप
२. तत्पुरुष (आनन्द) लृ विश्रान्तिरूप
३. वामदेव (ज्ञान) उ आनन्दरूप
४. ईशान (चित्) अ स्वाभावरूप
५. अघोर (क्रिया) ऋ प्रकाशरूप