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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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प्रथम विकास : ७
सम्बन्ध—योगी की तुर्य अवस्था के विचार में लौकिक जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति
को समझाया। अब उसी की तुर्यातीत अवस्था का विचार कहते हैं।
त्रितयभोक्ता वीरेशः ॥११॥
त्रितय—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति (अवस्थाओं का)
भोक्ता—स्वतन्त्रता से चमत्कार करने वाला (योगी)
वीरेशः—(भेदप्रथा को ग्रास करने वाले) वीरों में उत्तम वीर (है)।
व्याख्या—जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं में शक्तिचक्र का अनुसंधान करने वाला
योगी तुर्य के आनन्दरस से भरा रहता है। उसे भेद-प्रथा का अभाव रहता है। इस
आनन्दरस में मग्न वह हर अवस्था में (अश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् आदि) परम-व्योम रूप
शिवस्वरूप की भावना में मग्न रहता है और इस प्रकार इन तीनों अवस्थाओं में स्वा-
तन्त्र्य के चमत्कार से पूर्ण होता है। इस अवस्था की स्थिति को तुर्यातीत अवस्था
कहते हैं। उसका स्वातन्त्र्य रूप चमत्कार इस प्रकार कहा गया है :
'त्रिषु धामसु यद्भोग्यं भोक्ता भोगश्च यद्भवेत्।
तेभ्यो विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रोऽहं सदाशिवः ॥' (कठोपनिषद्)
अर्थ—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में जो कुछ भोग्य [विषय]
भोक्ता [विषयी] और भोग [विषयग्रहण] है, उससे विलक्षण मैं चिन्मात्र सदाशिव
साक्षी सर्वथा भिन्न हूँ।
ऐसा योगी केवल चिन्मात्र ही रहता है। संवित् साम्राज्य का वैभव होने
से वह भेद जगत् को ग्रास करने वाले वीरों में उत्तम वीर है क्योंकि वह अन्तः तथा
बाह्य प्रवणशील इन्द्रियों का अधीश्वर है। उसकी इन्द्रियां भेदप्रथारूप संसार में
ग्रस्त नहीं रहतीं। अतः योगियों में वही उत्तम योगी है। वही तुर्यातीत है ॥११॥
सम्बन्ध—तुर्यातीत योगी की परचित्-तत्त्व में स्थिति को सूचित करने वाली
अवस्था बतलाते हैं।
विस्मयो योगभूमिकाः ॥१२॥
योगभूमिकाः—(ऐसे योगी की) परविश्रान्ति को सूचित करने वाली
भूमिकाएँ (अवस्थाएँ)
विस्मयः—अवर्णनीय आश्चर्य (की मुद्रायें) हैं।
व्याख्या—जैसे किसी को अतिशय आनन्द की वस्तु पाकर आश्चर्यपूर्ण हर्ष होता
है वैसे ही परानन्द की अनुभूति में मग्न इस तुर्यातीत अवस्था में स्थित योगी को पर-
विश्रान्ति को सूचित करने वाली अवर्णनीय आश्चर्य-मुद्रायें होती हैं। उसके बोधसुधा