शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in contextप्रथम विकास : ५
अर्थ—तीन मलों से आवृत जीव (मनुष्य) इनको हटाने के दृढ़ अभ्यास से चिदा-
नन्दस्वरूप शिव से एक होते हैं जैसे सब छोटी-बड़ी नदियाँ एक ही समुद्र को प्राप्त कर
एक रूप होती हैं :
अतः 'उद्यमो भैरवः' सूत्र का तात्पर्य यही है कि साधक को 'तद्बुद्धयस्तदात्मानः'
(आत्मा में ही मन और बुद्धि लगा कर) रहना चाहिये ॥५॥
सम्बन्ध—बन्धन से छूटने के लिये अब भैरव-समाधि का प्रकार कहते हैं ।
शक्तिचक्रसंधाने विश्वसंहारः ॥ ६ ॥
शक्ति—शब्दादि शक्तियों (के)
चक्र—समूह (के)
संधाने—उन्मेष और अहंपरामर्शरूप अनुसंधान के होने पर
विश्व—भेदप्रथा रूप मलत्रयमय जगत् का
संहारः—परसंवित्रूप अग्नि में एकीकार होता है ।
व्याख्या—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध यह शक्तियों का समूह है । इनको
स्वरूप में विमर्श करना चाहिये । उस से परसंवित् रूप अग्नि में भेद प्रथा पैदा करने
वाले तीन मल भस्मीभूत होते हैं । यह शब्दादि भैरवरूप संवित्स्फार की महान् शक्तियाँ
हैं जो शाम्भवोपाय में क्रम और अक्रम का भी उल्लंघन करती हैं। शिवभाव से पृथ्वी
तत्त्व तक का यह शक्तिप्रसार प्रतिलोम वृत्ति से इन्हीं शक्तियों के संधान, अर्थात्
पर-संवित् स्वात्म-चमत्कृति, में एकीकार करना है । इसी से भेदमय जगत् का ह्रास
और शिवभाव की प्राप्ति होती है । यह शाम्भवोपाय में भैरव-समाधि है ॥६॥
सम्बन्ध—ऐसे योगी को समाधि और व्युत्थान का कोई भेद नहीं होता, यह कहते हैं।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिभेदे तुर्याभोगसम्भवः ॥७॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिभेदे—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की नानारूपता में पृथक्-
पृथक् अवभास होने पर
तुर्य—आत्मस्फुरणरूप तुर्यावस्था (के)
आभोग—चमत्कार (की)
सम्भवः—प्राप्ति (होती है) ।
व्याख्या—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के भेद में नानारूपता होती है । इन तीनों
अवस्थाओं में पृथक्-पृथक् अवभास होते हैं । परन्तु भैरव-समाधि का अभ्यास करने वाले
योगी को दोनों निमेषरूप समाधि और उन्मेषरूप समाधि में आत्मस्फुरण के अनुभव का
चमत्कार रहता है । इसे तुर्य अवस्था कहते हैं । ऐसे योगी को समाधि तथा व्युत्थान