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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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या काचिद् वै क्वचिदपि दशा किञ्चिदभ्यासपूरा-
दानन्दाख्या भवभयहरा स्यात् सुभक्तस्य सद्यः ।
सिद्धिः सैषा सुरपितृनृणां यस्य भक्त्या भवेन्नु
तं स्वात्मानं विभववपुषं सद्गुरुं वै प्रपद्ये ॥
अर्थ—'कहीं किसी दीर्घकाल तक निरन्तर चलने वाले धारावाहिक अभ्यास
से किसी श्रेष्ठ भक्त को तो तत्काल कोई अनिर्वचनीय, भवभयहारिणी आनन्दा-
वस्था प्राप्त हो जाती है, वही उसकी सिद्धि है । देवताओं, पितरों तथा मनुष्यों
को यह उत्कृष्ट सिद्धि, जिनकी भक्ति (सेवा-पूजा) से उपलब्ध होती है. उन
ज्ञानादि ऐश्वर्यमय स्वरूप वाले निजात्म-स्वरूप सद्गुरु की मैं शरण लेता हूं।'