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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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Page 22

XX
क्रमांक विषय सूत्रांक पृष्ठ
३. मन्त्र-वीर्य ३ १५
४. मितसिद्धियों में ध्येय को भूलना ४ १७
५. ईश्वर-कृपा से परप्रमातृभाव की सहज-स्थिति ५ १८
६. सहज-स्थिति की प्राप्ति का उपाय ६ २०
७. अहं-परामर्श का तात्त्विक क्रम ७,८,९ २०
८. स्वेच्छानुसंधान की कमी—एक रुकावट १० २३
तृतीय विकास
(आणवोपाय द्वारा शिवस्वरूप के आनन्दानुभव का वर्णन)
—साधारण जीवोपाय—
१. जीवात्मा का स्वरूप (तीनों परामर्शों में) १ २४
२. चित्त के बन्धन का कारण २ २५
३. तत्त्वों का अविवेक माया (तत्त्व-वर्णन) ३ २५
(क) आत्म-व्याप्ति प्रकरण—
४. समाधि में ही आत्मलाभ (आणवोपाय से ध्यान की विधि) ४ २७
५. अन्य साधन—प्राणायाम, धारणा, प्रत्याहार, समाधि ५,६ २९
(ख) शिव-व्याप्ति प्रकरण—
६. समाधि और व्युत्थान दोनों में आनन्द ७ ३१
७. शक्तिरूपता का वर्णन ८ ३३
८. विश्वनाटक का नट ९ ३४
९. नट-नाट्य-स्थान १० ३४
१०. विश्वनाटक के दर्शक ११ ३५
११. विशेष सात्त्विक बुद्धि से जगदानन्द-प्राप्ति १२ ३६
१२. स्वतन्त्रता की सिद्धि १३,१४ ३६
१३. स्वरूपस्थिति में सावधानता १५,१६ ३७
१४. विश्वव्यापिनी इच्छा १७,१८ ३९
१५. प्रमादवश मातृका द्वारा बहिर्मुखता १९ ३९
१६. चित्स्वरूपता की अनिवार्यता २० ४०
१७. तीनों अवस्थाओं में तुर्यरस के सेचन का उपाय २१ ४१
१८. योगी की विश्वमय-अवस्था का अनुभव (तुर्यातीत पद) २२ ४३
१९. मन्दप्राय योगी का अनुभव २३,२४ ४३