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शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished850 pages

Page 175 of 850

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Page 175

* रुद्रसंहिता *
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मुनिश्रेष्ठ मेधातिथिकी बुद्धिमती पुत्री होकर अरुन्धतीके नामसे विख्यात हुई। उत्तम व्रतका पालन करके उस देवीने ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरके कहनेसे श्रेष्ठ व्रतधारी महात्मा वसिष्ठको अपना पति चुना। वह सौम्य स्वरूपवाली देवी सबकी वन्दनीया और पूजनीया श्रेष्ठ पतिव्रताके रूपमें विख्यात हुई।

नारदजीने पूछा—भगवन्! संध्याने कैसे, किसलिये और कहाँ तप किया? किस प्रकार शरीर त्यागकर वह मेधातिथिकी पुत्री हुई? ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीनों देवताओंके बताये हुए श्रेष्ठ व्रतधारी महात्मा वसिष्ठको उसने किस तरह अपना पति बनाया? पितामह! यह सब मैं विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। अरुन्धतीके इस कौतूहलपूर्ण चरित्रका आप यथार्थ-रूपसे वर्णन कीजिये।

ब्रह्माजीने कहा—मुने! संध्याके मनमें एक बार सकामभाव आ गया था, इसलिये उस साध्वीने यह निश्चय किया कि 'वैदिकमार्गके अनुसार मैं अग्निमें अपने इस शरीरकी आहुति दे दूँगी। आजसे इस भूतलपर कोई भी देहधारी उत्पन्न होते ही कामभावसे युक्त न हों, इसके लिये मैं कठोर तपस्या करके मर्यादा स्थापित करूँगी (तरुणावस्थासे पूर्व किसीपर भी कामका प्रभाव नहीं पड़ेगा, ऐसी सीमा निर्धारित करूँगी)। इसके बाद इस जीवनको त्याग दूँगी।'

मन-ही-मन ऐसा विचार करके संध्या चन्द्रभाग नामक उस श्रेष्ठ पर्वतपर चली गयी, जहाँसे चन्द्रभागा नदीका प्रादुर्भाव हुआ है। मनमें तपस्याका दृढ़ निश्चय ले संध्याको श्रेष्ठ पर्वतपर गयी हुई जान मैंने अपने समीप बैठे हुए वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान्, सर्वज्ञ, जितात्मा एवं ज्ञानयोगी पुत्र वसिष्ठसे कहा—'बेटा वसिष्ठ! मनस्विनी संध्या तपस्याकी अभिलाषासे चन्द्रभाग नामक पर्वतपर गयी है। तुम जाओ और उसे विधिपूर्वक दीक्षा दो। तात! वह तपस्याके भावको नहीं जानती है। इसलिये जिस तरह तुम्हारे यथोचित उपदेशसे उसे अभीष्ट लक्ष्यकी प्राप्ति हो सके, वैसा प्रयत्न करो।'

नारद! मैंने दयापूर्वक जब वसिष्ठको इस प्रकार आज्ञा दी, तब वे 'जो आज्ञा' कहकर एक तेजस्वी ब्रह्मचारीके रूपमें संध्याके पास गये। चन्द्रभाग पर्वतपर एक देवसरोवर है, जो जलाशयोचित गुणोंसे परिपूर्ण हो मानसरोवरके समान शोभा पाता है। वसिष्ठने उस सरोवरको देखा और उसके तटपर बैठी हुई संध्यापर भी दृष्टिपात किया। कमलोंसे प्रकाशित होनेवाला वह सरोवर


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