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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

by शार्ङ्गधराचार्य

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished356 pages

Page 186 of 356

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Page 186

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150 | शार्ङ्गधरसंहिता | [मध्यमखण्डे

[Left Column]
कोशातकी देवदाली नीलिनी गिरिकार्णिका ।। 61 ।।
सातला पिप्पलीमूलं विडङ्गं कटुकी तथा।
हेमक्षीरी च विपचेत् कल्कैरेभिः पिचून्मितैः ।। 62 ।।
घृतप्रस्थं स्नुहीक्षीरं षट्पले तु पलद्वयम्।
अर्कक्षीरस्य मतिमांस्तत्सिद्धं गुल्मकुष्ठहृत् ।। 63 ।।
हन्ति शूलमुदावर्त्त शोथाध्मानं भगन्दरम्।
शमयत्युदराण्राष्टौ निपीतं बिन्दुसङ्ख्यया ।। 64 ।।
गोदुग्धेनोष्ट्रदुग्धेन कौलत्थेन शृतेन वा।
उष्णोदकेन वा पीत्वा बिन्दुवेगैर्विरेचयेत् ।। 65 ।।
एतद् बिन्दुघृतं नाम नाभिलेपाद् विरेचयेत्।
चीता की जड़, शंखपुष्पी (शंखाहुली), हरड़, कबीला,
सफेद निसोत, कालीनासोत, विधारा, अमलतास, दन्ती,
जमालगोटा, कड़वी तोरई, वन्दाल, नील के पत्ते, गिरिकर्णिका
(इसपन्द), सतवन, पीपलामूल, वायविडंग, कुटकी एवं चोक
(सत्यानाशी की जड़)-इन सब द्रव्यों को एक-एक कर्ष
(1-1 तोला) लेकर कल्क बनायें। घृत एक प्रस्थ (3 पाव 4
तोला), सेहुण्ड (थूहर) का दूध छः पल (24 तोला) और
मदार (आक) का दूध दो पल (8 तोला), इन सबको एक
साथ मिलाकर पाक करना चाहिये। जब पाक सिद्ध हो जाये
तो छानकर रख लें। यह घृत वायुगोला एवं कुष्ठ को हरता है,
शूल, उदावर्त्त, शोथ, अफरा, भगन्दर एवं आठ प्रकार के
उदररोगों को शान्त करता है। इसकी मात्रा बूँदों को गिनकर
निर्धारित की जाती है। गाय का दूध, ऊँटनी का दूध, कुलथी
का क्वाथ एवं उष्ण जल में डालकर पीने से बिन्दुओं की
संख्या (गिनती) के अनुसार विरेचन (दस्त) होते हैं, अतएव
इसका नाम 'बिन्दुघृत' है और यह उदर पर लेप करने से भी
विरेचन करता है।
वक्तव्य-इस 'षड्बिन्दु घृत' में सभी द्रव्य दस्तावर हैं।
अतः यह घृत उच्चकोटि का विरेचक है। इसकी मात्रा बिन्दु
या बूँद के परिमाण में दी जाती है। यद्यपि कहा गया है कि
जितने बिन्दु पीयें जायें उतने दस्त होते हैं, किन्तु दस्तों
की-संख्या कोष्ठ की मृदुता तथा क्रूरता पर निर्भर करती है।
एरण्ड के तेल की भाँति यह भी उदर पर लगाने से विरेचन
कराता है। एक बात का भली-भाँति स्मरण रखना चाहिये
कि औषधियाँ शरीर में किसी भी मार्ग से प्रविष्ट होकर उसी
अवयव पर अपना प्रभाव डालती हैं, जहाँ पर आवश्यकता
होती है। देखने में आता है कि सेर दो सेर जमालगोट को
शुद्ध करते समय निरन्तर दो-तीन दिन तक छीलने वाले

[Right Column]
व्यक्ति को दस्त लग जाते हैं, मूत्रल पदार्थों का पेट पर लेप
करने से मूत्रबन्ध खुल जाता है, इत्यादि। तात्पर्य यह है कि
उस स्थान का जहाँ पर औषधि का प्रयोग किया जाता है, उस
स्थान से जहाँ पर रोग है भले ही सीधा सम्बन्ध न हो, तथापि
औषधि का प्रभाव उसी स्थान पर होता है, जहाँ पर रोग
होता है।
त्रिफला घृत
त्रिफलाया रसप्रस्थं प्रस्थं वासारसोद्भवम् ।। 66 ।।
भृङ्गराजरसप्रस्थं प्रस्थमाजं पयः स्मृतम्।
दत्त्वा तत्र घृतप्रस्थं कल्कैः कर्षमितैः पृथक् ।। 67 ।।
त्रिफला पिप्पली द्राक्षा चन्दनं सैन्धवं बला।
काकोली क्षीरकाकोली मेदा मरिचनागरम् ।। 68 ।।
शर्करा पुण्डरीकं च कमलं च पुनर्नवा।
निशायुग्मं च मधुकं सर्वैरेभिर्विपाचयेत् ।। 69 ।।
नक्तान्ध्यं नकुलान्ध्यं च कण्डूं पिल्लं तथैव च।
नेत्रस्त्रावं च पटलं तिमिरं काचकं जयेत् ।। 70 ।।
अन्येऽपि प्रशमं यान्ति नेत्ररोगाः सुदारुणाः।
त्रैफलं घृतमेतद्धि पाने नस्यादिषूचितम् ।। 71 ।।
त्रिफला का रस या क्वाथ एक प्रस्थ (64 तोला), अडूसा
का रस एक प्रस्थ, भाँगरा का रस एक प्रस्थ, बकरी का दूध
एक प्रस्थ, इन सब द्रवों में एक प्रस्थ घृत डालकर निम्नलिखित
द्रव्यों का कल्क डालकर परिपाक करना चाहिये। वे द्रव्य
हैं-हरड़, बहेड़ा, आँवला, पिप्पली, मुनक्का, सफेद चन्दन,
सेंधा नमक, बरियारा, काकोली, क्षीरकाकोली (अभाव में
अश्वगन्धा दो कर्ष), मेदा (शतावरी), मरिच, सोंठ, खाँड,
नीलकमल, पुनर्नवा, दारुहल्दी एवं हल्दी प्रत्येक द्रव्य 1-1
तोला। इस घृत का सेवन करने से नक्तान्ध्य (रतौन्धी),
नकुलान्ध्य (नेवला के समान आँखें चमकती हैं और दिखलायी
नहीं पड़ता), आँख की खुजली, पिल्ल (नामक नेत्ररोग
देखें-वा० उ० अ० 16), नेत्रस्राव (उलका), पटलगत रोग,
तिमिर (धुन्ध) एवं काच (मोतिया) नामक रोग को जीतता
है। इसके सेवन से और भी भयानक नेत्ररोग शान्त हो जाते
हैं। इसका नाम 'त्रिफला घृत' है। इसका प्रयोग पीने, नस्य,
नेत्र-तर्पण आदि में किया जाता है।
गौराद्य घृत
द्वे हरिद्रे स्थिरा मूर्वा सारिवा चन्दनद्वयम्।
मधुपर्णी च मधुकं पद्मकेशरपद्मकैः ।। 72 ।।