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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

by शार्ङ्गधराचार्य

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished356 pages

Page 180 of 356

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Page 180

नवमोऽध्यायः
घृततैलकल्पना

स्नेहपाक की विधि
कल्काच्चतुर्गुणीकृत्य घृतं वा तैलमेव वा।
चतुर्गुणे द्रवे साध्यं तस्य मात्रा पलोन्मिता।। 1।।
कल्क से चौगुना घी अथवा तेल को लेकर चौगुने
द्रवपदार्थ में सिद्ध करना चाहिये। इसकी सामान्य मात्रा (पान
करने की) एक पल (4 तोला) है।
वक्तव्य-रोगनाशक द्रव्यों को घी अथवा तेल में पकाने
से उनके गुण घी तथा तेल में विलीन हो जाते हैं। यही कारण
है कि घी तथा तेल के सेवन से वे ही गुण प्राप्त हो जाते हैं,
जो उन द्रव्यों के सेवन से होते हैं। उक्त श्लोक का तात्पर्य यह
है, कि जिन द्रव्यों के गुण घी अथवा तेल में विलीन करना
अभीष्ट हो, उन द्रव्यों का भली प्रकार कल्क या चटनी बनाकर
और कोई अभीष्ट द्रव पदार्थ डालकर तथा एक साथ तीनों
द्रव मिलाकर पाक करना चाहिये। स्नेह से चौगुना द्रव एवं
चौथाई कल्क होना चाहिये। 'स्नेहाच्चतुर्गुणो द्रवः
स्नेहचतुर्थांशो भेषजकल्कस्तदेकध्यं संसृज्य विपचेत्,
इत्येषः स्नेहपाककल्पः' (सु० चि० अ० 31.8)। ध्यान
दें-पाक करने पर घृत एवं तैल प्रायः चार सेर के तीन सेर रह
जाते हैं, क्योंकि उनका बहुत अंश वाष्प के साथ उड़ जाता है
और कुछ कल्क में सटा रह जाता है।
स्नेहपाकार्थ क्वाथ-विधि
निक्षिप्य क्वाथयेत् तोयं क्वाथ्यद्रव्याच्चतुर्गुणम्।
पादशिष्टं गृहीत्वा च स्नेहं तेनैव साधयेत्।। 2।।
क्वाथ्य द्रव्य (जिसका क्वाथ बनाना हो) से चौगुना
जल डालकर क्वाथ बनाना चाहिये, जब चौथाई भाग शेष रह
जाये तो छान लें। इसी से स्नेहपाक करना चाहिये।
क्वाथ में जल का परिमाण
चतुर्गुणं मृदुद्रव्ये कठिनेऽष्टगुणं जलम्।
तथा च मध्यमे द्रव्ये दद्यादष्टगुणं पयः।। 3।।
अत्यन्तकठिने द्रव्यं नीरं षोडशिकं मतम्।
क्वाथ-निर्माण में मृदु (शीघ्र गलने वाले) द्रव्य में चौगुना,
कठिन में आठ गुना, मध्यम कोटि के द्रव्य में भी आठ गुना
तथा अत्यन्त कठिन (कठोर) द्रव्य में सोलह गुना जल डालना
चाहिये।
वक्तव्य-क्वाथ बनाने का प्रयोजन यह होता है कि
द्रव्यों के गुण जल में विलीन हो जायें। जब तक द्रव्य गल न
जाये तब तक उसके सम्पूर्ण गुण जल में नहीं आते। अतएव
द्रव्यों की मृदुता एवं कठिनता आदि का विचार करके इतना
जल डालना चाहिये, जितने से द्रव्य का पाक भली-भाँति हो
जाये।
अन्य प्रकार से जल का मान
कर्षादितः पलं यावत् क्षिपेत् षोडशिकं जलम्।। 4।।
तदूर्ध्वं कुडवं यावद् भवेदष्टगुणं पयः।
प्रस्थादितः क्षिपेन्नीरं खारीं यावच्चतुर्गुणम्।। 5।।
एक कर्ष (1 तोला) से पल (4 तोला) भर तक परिमाण
वाले द्रव्य में सोलह गुना जल, एक पल से कुडव (16
तोला) भर तक के द्रव्य में आठ गुना तथा एक प्रस्थ से खारी
भर तक द्रव्य में चौगुना जल डालना चाहिये।
वक्तव्य-द्रव्यों का परिपाक होने में उनके परिमाण के
अनुसार जल की आवश्यकता होती है। थोड़ा-सा द्रव्य जब
कि सोलह गुने जल में पकता है तो बहुत-सा द्रव्य चौगुने ही
जल में पक जाता है। इसीलिए थोड़े द्रव्य में सोलह गुना और
अधिक द्रव्य में चौगुना जल डालने का विधान किया गया है।
स्नेह में कल्क का परिमाण
अम्बुक्वाथरसैर्यत्र पृथक् स्नेहस्य साधनम्।
कल्कात्त्र्यंशं तत्र दद्याच्चतुर्थं षष्ठमष्टमम्।। 6।।