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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

by शार्ङ्गधराचार्य

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished356 pages

Page 175 of 356

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Page 175

अष्टमोऽध्यायः
अवलेहकल्पना


अवलेह-निर्माण-विधि

क्वाथादीनां पुनः पाकाद् घनत्वं सा रसक्रिया।
सोऽवलेहश्च लेहः स्यात् तन्मात्रा स्यात् पलोन्मिता।।1।।

क्वाथ आदि अर्थात् स्वरस, फाण्ट तथा कल्क के दोबारा पाक करने से जो गाढ़ा पदार्थ तैयार किया जाता है, उसे 'रसक्रिया' कहा जाता है। उसी को 'अवलेह' तथा 'लेह' भी कहा जाता है। उसकी मात्रा एक पल (4 तोला) होती है।

वक्तव्य—औषधद्रव्य का पहले क्वाथ आदि प्रस्तुत करके फिर उसे पकाकर गाढ़ा कर लेते हैं। यह रसवंत बनाने की विधि है। यथा—दारुहल्दी का क्वाथ करके छान लिया जाता है और उस क्वाथ को पुनः पकाकर गाढ़ा कर लिया जाता है, यही 'रसवंत' है। इसका पाक उतना ही किया जाता है, जितने से पदार्थ चाटने योग्य बन जाये। इसलिये इसका नाम अवलेह रखा गया है। इसकी एक पल मात्रा का उल्लेख भी सामान्य ही है। औषध के बलाबल का विचार कर मात्रा की व्यवस्था करनी चाहिये। शर्बत बनफ्शा; शिकंजवी आदि भी 'अवलेह' की ही श्रेणी में आते हैं।


अवलेह में सिता आदि का मान

सिता चतुर्गुणा कार्या चूर्णाच्च द्विगुणो गुडः।
द्रवं चतुर्गुणं दद्यादिति सर्वत्र निश्चयः ।।2।।

अवलेहों में चूर्ण (जिसका अवलेह बनाना हो) उससे चीनी चौगुनी, गुड़ दुगुना और द्रव पदार्थ चौगुना लिया जाता है। यह सभी अवलेहों के निर्माण करने की विधि है।

वक्तव्य—जिस द्रव्य का अवलेह बनाना हो उससे चौगुनी चीनी अथवा दुगुना गुड़ एवं चौगुना द्रव द्रव्य डालकर एक साथ पकाया जाता है। इस प्रकार अवलेह तैयार हो जाता है। इस विधि से बनाये गये अवलेह 'कण्टकारी अवलेह' आदि कहे जाते हैं। जो 'शर्बत अडूसा' आदि बनाये जाते हैं, उनकी भी विधि यही है; अन्तर केवल इतना है कि उक्त शर्बत अडूसा आदि द्रव्य का काढ़ा बनाकर एवं छानकर उसमें चीनी मिलाकर चासनी पकायी जाती है। शर्बत अनार एवं शर्बत निम्बू आदि में उक्त द्रव्यों के रस डालकर बनाये जाते हैं तथा शिकंजवी ईख का सिरका या नींबू के रस के मिश्रण से बनायी जाती है। तीन प्रकार के अवलेह—केवल द्रव्यों के, जिनमें चीनी आदि नहीं मिलाये जाते। जैसे—1. रसबवत या रसाञ्जन, 2. द्रव्यों के चूर्ण से युक्त, यथा—च्यवनप्राश आदि और 3. द्रव्यों के क्वाथ या रस आदि के संयोग से निर्मित, यथा—शर्बत अडूसा आदि। पुनरपि ये दो प्रकार के माने जाते हैं—1. अग्निपक्व अवलेह, यथा—रसवंत एवं शर्बत और 2. आतपपक्वावलेह, यथा—गुलाब का गुलकन्द, अडूसा के फूलों का गुलकन्द आदि; इसमें फूलों का कल्क बनाया जाता है और कड़ी धूप में रखकर पाक किया जाता है।


अवलेह-सिद्धि का लक्षण

सुपक्वे तन्तुमत्त्वं स्यादवलेहोऽप्सु मज्जति।
स्थिरत्वं पीडिते मुद्रागन्धवर्णरसोद्भवः ।।3।।

उचित रूप से परिपाक होने पर अवलेह (शर्बत) में तन्तु (तार) पड़ने लगती है, वह अवलेह जल में डूब जाता है और कुछ अवलेहों में स्थिरता तथा अँगुली आदि से दबाने पर मुद्रा (निशान) पड़ना और गन्ध (उचित गन्ध), वर्ण (उचित वर्ण) तथा रस (उचित रस या स्वाद) की उत्पत्ति हो जाती है।

वक्तव्य—उक्त श्लोक की पहली पंक्ति द्वारा शर्बतों के परिपाक का लक्षण बतलाया गया है और दूसरी पंक्ति द्वारा च्यवनप्राश आदि चूर्ण युक्त अवलेहों के परिपाक का लक्षण बतलाया गया है। जिन लोगों का विचार है कि शर्बत एवं गुलकन्द केवल यूनानी चिकित्सकों का ही आविष्कार है,