सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
Page 63 of 415
Read in contextसौंदर्य लहरी २३
सनातन धर्म में सगुणोपासना के पांच मुख्य सम्प्रदाय है,
सगुण पंचोपासना वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत्य और सौर, जिनमें
एक ही ब्रह्म की क्रमशः विष्णु, शिव, शक्ति,
गणपति और सूर्य पांच रूपों में उपासना की जाती है । शंकराचार्य
के पूर्व पांचों सम्प्रदायों के अनुयायी आपस में द्वेष बुद्धि रखते थे
और आपस में लडा करते थे, परन्तु श्री मच्छंकराचार्य ने सब में
एक ही ब्रह्म की उपासना सिद्ध कर के उनका पारस्परिक द्वेष दूर
किया और सब को एक ब्रह्मवाद के सूत्र में बांधकर सनातन धर्म
का एक संगठन बनाया, तब से सब ही उपासनाओं का लक्ष ब्रह्म
प्राप्ति माना जाने लगा है । विष्णु का अर्थ सर्वव्यापी है, इसलिये
ब्रह्मांड का स्वामी, जो सगुण रूप से सब का पालन कर्ता है, बहिर्दृष्टि
से उपासना करने वालों का इष्ट है । शिव प्रायः निर्गुण ब्रह्म
का वाचक समझा जाता है । शिव पद की प्राप्ति निर्विकल्प समाधि
द्वारा ही होती है, इसलिये शिव का चित्र सदा समाधिस्त अवस्था
में ही दिखाया जाता है । शक्ति परब्रह्म की शक्ति है, जो सारे विश्व
में व्यक्त होकर अनेक रूप धारण कर रहो है । गणपति शिवशक्ति के
योग से समाधि में उदय होने वाली ऋतंभरा प्रज्ञा का ज्ञान भण्डार
है, जिसमें ऋद्धि सिद्धि प्रकट होती हैं । उसका हाथी का सिर यह
प्रकट करता है कि साधक का पशुत्व अभी नष्ट नहीं हुवा है,
क्योंकि ब्रह्मज्ञान की बाधक सिद्धियां विघ्न बनकर उसे गिरा सकती
हैं, परन्तु ज्ञान तो स्वयं ब्रह्म ही है, ' सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म '
इसलिये गणेश रूप से ज्ञान रूपी ब्रह्म की उपासना करने वालों को
विघ्नों का भय नहीं रहता । सूर्य सारे विश्व का प्राण माना जाता है.