सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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सावयव अनुभव किया जा सकता है और शाब्दी सूक्ष्म मंत्रमयी है।
योगिनी हृदय में भावना के तीन प्रकार इस प्रकार कहे गये हैं।
आज्ञान्तं सकलं प्रोक्तं ततः सकलनिष्कलम् ।
उन्मन्यन्ते परे स्थाने निष्कलं च त्रिधास्थितम् ॥
अर्थः—मूलाधार से आज्ञाचक्र तक सगुण रूप कहा जाता
है, उसके ऊपर उन्मनी तक सगुण निर्गुण, और उसके अंत में
सहस्रारस्थ परम स्थान पर निष्कल निर्गुण की स्थिति है; इसलिये
तीनों में वैसे ही भावना करना चाहिये। यह आर्थी भावना के
भेद हैं।
शाब्दी भावना के अंतर्गत, मंत्रों का न्यास, प्राणप्रतिष्ठा और जप
स्वाध्याय का समावेश है। वैदिक, तांत्रिक और पौराणिक भेद से
मंत्र अनेक हैं, परन्तु वे सब एक नादरूपा नामरूपविवर्जिता शक्ति
के ही अनेक पदवाचक रूप हैं, जैसा कि कहा है
यदा भवति सा संवित् विगुणीकृतविग्रहा ।
सा प्रसूते कुंडलिनी शब्दब्रह्ममयी विभुः ॥
शक्तिस्ततो ध्वनिस्तस्मान्नादस्तस्मान्निरोधिका ।
ततोऽर्धेन्दुस्ततो विन्दुस्तस्मादासीत्परात्ततः ॥
पश्यन्ति मध्यमा वाणी वैखरीसर्गजन्मभूः
इच्छाज्ञानक्रियात्मासौ तेजोरूपा गुणात्मिका ।
क्रमेणानेन सृजति कुण्डलिन्यर्णमालिकाम् ।
विश्वात्मना प्रबुद्धा सा सूते मंत्रमयंजगत् ॥