सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी : ८२
विशुद्ध चक्र से आकाश नीचे उतरकर पिघलता हुआ नीचे गिर
रहा है। आकाश तत्व के वेध की पिघलाई से सुन्दर उपमा दी गई
है। जिन योगियों को तत्त्ववेध की क्रिया का ज्ञान है, उनको ही
यहां बुद्धिमान कहा गया है।
कालिन्दी अर्थात् यमुना सूर्य पुत्री है। नाभि में उगने वाली
आकाश रूपी रोमावलि हृदय के सूर्य मण्डल से नीचे उतर रही
है, इसलिये उसकी उपमा यमुना नदी की तरंग से दी जानी
सर्वथा संगत है। और आकाश, रोमावलि और यमुना तीनों का
वर्ण भी श्याम है। यमुना पिंगला नाडी को भी कहते हैं. जिसका
संबंध प्राण से है और प्राण की क्रिया से ही षट् चक्र वेध होता है।
इस अभिप्राय से भी कालिन्दी रूपी पिंगलागत प्राण की क्रिया से
उनकी उपमा ठीक सिद्ध होती है।
( ७८ )
स्थिरं गङ्गाऽऽवर्तः स्तनमुकुलरोमावलिलता-
निजाबालं कुण्डं कुसुमशरतेजोहुतभुजः ।
रतेर्लीलाऽगारं किमपि तव नाभिर्गिरिसुते
बिलद्वारं सिद्धे गिरिशनयनानां विजयते ॥
कठिन शब्दः— आवाल=गमला, कुसुमशर=कामदेव
अर्थः— हे गिरि सुते ! तेरी नाभि की जय है। उसकी
उपमा नीचे दिये हुए किसी भी प्रकार से दी जा सकती है।