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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 311

सौंदर्य लहरी २६१
अर्थः—हे पर्वत राज की पुत्रि तेरी दोनों वक्र कनपटियां
किसकी बुद्धि में पुष्पवाण धारण करने वाले धनुष के कोणों
का कौतुहल न करेंगी । जहां श्रवणपथ का उल्लंघन करके तेरा
तिरछा कटाक्ष कनपटी को लांघकर कान तक पहुंचा हुआ बाण
सदृश दिखता है. जो दोनों भौंहों के धनुष पर चढ़ा हुआ हैं.
कनपटियां धनुष के कोण हैं । भगवती की त्योरी रूपी धनुष पर
चढ़े हुए कटाक्ष रूपी बाण से समस्त बाधाओं का नाश
होता है ।
मुख का ध्यानः—
[ ५९ ]
स्फुरद्गण्डाभोगप्रतिफलितताटंकयुगलं
चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथरथम् ।
यमारुह्य (यमाश्रित्य) द्रुह्यत्यवनिरथमर्केन्दुचरणं
महावीरो मारः प्रमथपतये सज्जितवते ॥
कठिन शब्दों का अर्थः— ताटंक=कर्णफूल ।
अर्थः—तेरे चमकते हुए कपोलों पर प्रतिबिंबित दोनों
कर्णफूलों युक्त तेरा मुख मुझे चार पहियों वाला कामदेव का
रथ जंचता है, जिस पर चढ़ कर अथवा जिसका आश्रय लेकर
महावीर कामदेव, सूर्य और चन्द्रमा दो पहियों वाले पृथिवी
रूपी रथ पर युद्धार्थ सुसज्जित शंकर के विरुद्ध अड़ा है ।