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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 309 of 415

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Page 309

सौन्दर्य लहरी ३०२
[ ५६ ]
तवापर्णे कर्णे जपनयन पैशुन्य चकिता
निलीयन्ते तोये नियतमनिमेषाः शफरिकाः ।
इयं च श्रीर्बद्धच्छदपुटकवाटं कुवलयं
जहाति प्रत्यूषे निशि च विघटय्य प्रविशति ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— शफरिका=मछली; कुवलय=कुमुद ।
अर्थ:— हे अपर्णे ! निमेष रहित मछलियां तो सदा पानी
में छुपी रहती हैं, उनको यह भय रहता है कि कहीं तेरी
आंखें ईर्ष्या वश उनकी चुगली तेरे कानों से न करदें, और
यह लक्ष्मी सवेरा होने पर कपाटों के सदृश बंद हो जाने वाले
दलयुक्त कुमुदिनी को छोड जाती है, और रात्रि को उन्हें खोल
कर प्रवेश करती है ।
भाव यह है कि भगवती के निमेषोन्मेषवर्जित नेत्रों की प्रति-
द्वंद्वी एक तो मछलियां हैं, दूसरी कुमुदिनी है । मछली तो पानी में
छुपी रहती है, और कुमुदिनी रात्रि को ही खिलती है और दिन में
बंद होकर श्री (कांति) हीन हो जाती है ।