सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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पवित्री कर्तुं नः पशुपतिपराधीनहृदये
दयामित्रै र्नेत्रैररुणधवलश्यामरुचिभिः ।
नदः शोणो गङ्गा तपनतनयेति ध्रुवममु ( मयं )
त्रयाणां तीर्थानामुपनयसि संभेदमन्वहम् ॥
अर्थः—पशुपति शंकर भगवान की पराधीनता में हृदय
समर्पण करने वाली हे भगवती ! अरुण, शुक्ल, और श्याम वर्णों की
शोभा से युक्त दयापूर्ण अपने नेत्रों से सोणनदी, गंगा और
सूर्यतनया ( जमुना ) इन तीनों तीर्थों के सदृश निश्चय ही हम
लोगों को पवित्र करने के लिये तू पवित्र संगम बना रही है ।
गंगा और यमुना का संगम प्रयाग में है जो दोनों नेत्रों के
बीच है, वह भ्रू मध्य भाग काशी है । उसके ऊपर तीसरा नेत्र
सोणनदी है । ज्ञाननेत्र में तीनों का एकीकरण होता है । सोणनदी
काशी से कुछ आगे चल कर गंगाजी से मिलती है । नासिका के
अग्रभाग पर, भ्रूमध्य में और ललाट प्रदेश में ध्यान करने की विधि
योग धारणा के प्रधान साधन हैं । उन स्थानों पर धारणा करके वहां
चित्त को ध्यान मग्न कर देना ही उक्त तीर्थों में स्नान करना है ।