सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextकहते हैं। ब्रह्मग्रंथि का स्थान मूलाधार में, विष्णुग्रंथि का स्थान
हृदय में और रुद्रग्रंथि का स्थान आज्ञाचक्र में समझना चाहिये।
ललितासहस्रनाम में ग्रंथित्रय के स्थानों का वर्णन इस प्रकार है:—
मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रंथि विभेदिनी।
मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रंथि विभेदिनी ॥ ८९
आज्ञाचक्रान्तरालस्था रुद्रग्रंथि विभेदिनी।
सहस्राराम्बुजारूढा सुधासारामिवर्षिणी ॥ ९०
भूतजय होने पर रुद्रग्रंथि का, इंद्रिय जय होने पर ब्रह्मग्रंथि का
और मनोजय होने पर विष्णुग्रंथि का बेध जानना चाहिये। भूतजय
होने पर मधुमतीका भूमिका का उदय होता है और इंद्रिय एवं
मनोजय होने पर मधुप्रतीका भूमिका का। इनसे पूर्व कुण्डलिनी
जागरणोपरान्त रजतमोमिश्रित सत्व गुण की भूमिका का नाम प्रारम्भ
कल्पिका और ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होनेपर शुद्धसत्व गुण प्रधान
भूमिका का नाम मधुमती भूमिका है। देखें योगदर्शन विभूतिपाद
सूत्र (५१) पर व्यास भाष्य और श्लोक १८ पृष्ठ (१३०)।
संवर्ताग्नि प्रलयाग्नि को कहते हैं, उसे पाताल स्थित कालाग्नि
भी कहते हैं। शंकर भगवत्पाद ने निम्न चक्रों में
[पार्श्व टिप्पणी: विद्यु त्रय / पंचाग्नि विद्या / और ब्रह्मचर्य] स्थित अग्नि को जो लयाभिमुख होकर सब तत्वों
को अपने २ कारण में लीन करता है, संवर्ताग्नि
कहा है। क्योंकि केवल तीन ही अग्नियों का
यहां वर्णन है, अर्थात स्वाधिष्ठानस्थ संवर्त अग्नि, मणिपूरस्थ विद्युताग्नि