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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 256 of 415

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Page 256

२०६ सौन्दर्य लहरी
नारायणोपनिषद् में भी हृद्देश में दीपशिखा का ध्यान करने
का उपदेश मिलता है। उसका वर्णन इस प्रकार है:—
तस्य मध्ये (हृदयस्य) वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता
नीलतोयदमध्यस्थाद्विद्युल्लेखेवभास्वरा, नीवारशूकवत्तन्वी
पीता भास्वत्यणूपमा। तस्याः शिखायामध्ये परमात्मा
व्यवस्थितः, सब्रह्मा, सशिवः, सहरिः, सेन्द्रः सोऽक्षरः
परमःस्वराट् (ना० खण्ड १२)
अर्थ:—उस हृदय कमल के मध्य में अग्नि की छोटीसी
शिखा है। नीलवर्ण के मेघों में चमकने वाली विद्युत् रेखा के सदृश
पीले रंग की धान्य के तिनके के अग्रभाग जैसी पतली होती है।
उस शिखा के मध्य में परमात्मा रहते हैं, वह ही ब्रह्मा, शिव, हरि,
इन्द्र और अक्षर परब्रह्म है। विद्युत् प्रकाश में दिखने वाले श्याम
मेघ सदृश रंग हंसेश्वर का और पीत वर्ण हंसेश्वरी का समझना
चाहिये। वैष्णव सम्प्रदाय में पीतवर्णा श्रीजी और श्यामवर्ण भगवान्
का हृदय में ध्यान इसी आधार पर बताया जाता है। १४ श्लोकोक्त
५४ वायव्य किरणें आधी हंसेश्वर की और आधी हंसेश्वरी की हैं।
बृहदारण्यकोपनिषद् में भी इसका वर्णन मिलता है, वह
इस प्रकार है:—
मनोमयोयं पुरुषो भाःसत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहि-
र्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं
प्रशास्ति यदिदं किंच ॥ (५, ६, १)