सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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दिखते हैं। जैसे अंधकार प्रकाश की अपेक्षा रखता है, इसी प्रकार
अचेतन चेतन प्रकाश की अपेक्षा रखता है। क्योंकि प्रकाश का
तिरोभाव अंधकार का कारण है, और चेतना का तिरोभाव अचेतना
का कारण। जैसे समुद्र की तरंगों के उठाव उतार पर अथवा भूमि
की ऊंचे नीचे धरातल पर प्रकाश पड़ने से कहीं प्रकाश दिखता है,
कहीं छाया का अंधकार, उसी प्रकार सत् शक्ति के परिणाम की
विषमता पर प्रतिबिंबित् चिदानन्दाकार के कारण कहीं चेतनता
कहीं अचेतनता की अनुभूति समझनी चाहिये। वेदानुवचन हैं कि
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबल क्रिया च।
(श्वे० ६, ८)
इच्छा, ज्ञान और क्रिया भेद से वह पराशक्ति त्रिधा दिख रही
है। चितिशक्ति का स्थान सहस्रार में हैं और उन्मनी समनी दोनों
स्तरों पर व्यक्त होती है, उन्मनी में सूक्ष्म सामान्य रूप से और समनी
पर विशेष रूप से। चिदानन्द की अभिव्यक्ति व्यापिका और शक्ति
के स्तरों पर होती है, व्यापिका पर सूक्ष्म अविशेष सामान्य अभि-
व्यक्ति है और शक्ति के स्तर पर विशेष घनानन्द स्वरूप की अभि-
व्यक्ति है। नीचे के स्तरों पर सत् शक्ति का शब्द और अर्थ
अथवा नाम और रूप दो भेद से फटाव हो जाता है। पहिले शब्द,
फिर रूप की अभिव्यक्ति होती है। महानाद और नाद दो स्तरों
पर शब्दात्मज्ञान के हैं, महानाद पर अविशेष और नाद पर सवि-
शेष ज्ञान की अनुभूति रहती है। उनके नीचे विन्दु अर्धेन्दु और
निरोधिका के उत्तरोत्तर स्तर रूपों के संप्रज्ञात भेद हैं। मन का